सुंदरबन में बाघ की घुसपैठ रोकने के लिए अब हाइटेक कवच
दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन के जंगलों से सटे गांवों में बाघ के दाखिल होने की घटनाएं हर साल सामने आती रही हैं. बीते कुछ वर्षों में इन घटनाओं में बढ़ोतरी ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है.
By AKHILESH KUMAR SINGH | Updated at :
26 किमी के दायरे में 300 विशेष ‘फिशिंग सेंसर’ लाइट की होगी व्यवस्था
संवाददाता, कोलकाता
दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन के जंगलों से सटे गांवों में बाघ के दाखिल होने की घटनाएं हर साल सामने आती रही हैं. बीते कुछ वर्षों में इन घटनाओं में बढ़ोतरी ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है. अब बाघ की घुसपैठ पर लगाम लगाने के लिए वन विभाग ने तकनीक आधारित नयी रणनीति अपनायी है. जंगल की सीमा पर अत्याधुनिक ‘फिशिंग सेंसर लाइट’ और सौरचालित ‘एनिमल इंट्रूजन डिटेक्शन एंड रिपेलेंट सिस्टम (एएनआइडीइआरएस)’ लगाये जा रहे हैं.
वन विभाग के अनुसार, कुलतली बीट कार्यालय क्षेत्र में करीब 26 किलोमीटर के दायरे में करीब 300 विशेष फिशिंग सेंसर लाइट लगाये जा रहे हैं. ये लाइट जंगल से सटे खाल और खाड़ियों के किनारे, जहां सुरक्षा जाल या नेट लगाये गये हैं, वहां ऊंचे पेड़ों की डालियों और जाल पर स्थापित की जा रही हैं. शाम होते ही ये लाइट स्वत: जल उठेंगी और लाल, नीली, पीली व हरी रोशनी उत्सर्जित करेंगी. अधिकारियों का दावा है कि अचानक बदलती तेज रोशनी बाघ को बस्तियों की ओर बढ़ने से रोकेगी. पाथरप्रतिमा क्षेत्र के एक गांव में परीक्षण के दौरान सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद इसे कुलतली में विस्तारित किया गया है.
जंगल से सटे इलाकों में पहले से लगाये जा चुके हैं करीब 10 फीट ऊंचे नेट
दक्षिण 24 परगना वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि बाघ के प्रवेश को रोकने के लिए जंगल से सटे इलाकों में करीब 10 फुट ऊंचे नेट पहले ही लगाये जा चुके हैं. अब उन्हीं के पास और पेड़ों पर ये सेंसर लाइट लगाकर सुरक्षा घेरा मजबूत किया जा रहा है. स्थानीय निवासियों ने इसे राहत देने वाला कदम बताया है. इसी क्रम में रायदिघी रेंज के हेरोवांगा-नौ वन कंपार्टमेंट के संवेदनशील इलाकों में वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और दक्षिण 24 परगना वन विभाग की संयुक्त पहल पर एएनआइडीइआरएस प्रणाली स्थापित की जा रही है. यह गैर-घातक, तकनीक आधारित सिस्टम है, जो 180 डिग्री कोण में 25 से 30 मीटर तक की गतिविधि पहचान सकता है. सौर पैनल से संचालित यह उपकरण पशु की मौजूदगी का संकेत मिलते ही वनकर्मियों को सतर्क कर देता है, ताकि समय रहते कार्रवाई की जा सके. फिलहाल चार उपकरण लगाये गये हैं और पायलट परियोजना के तहत इसकी तकनीकी क्षमता, पहचान की सटीकता व बाघ की घुसपैठ कम करने में प्रभावशीलता का आकलन किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश के पीलीभीत और कतर्नियाघाट में सफल प्रयोग के बाद पहली बार सुंदरबन में इसे लागू किया गया है. वन विभाग का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो मानव-बाघ संघर्ष में उल्लेखनीय कमी लायी जा सकेगी और जंगल से सटे गांवों में सुरक्षा का नया मॉडल विकसित होगा.