राज्य में ध्रुवीकरण के नये केंद्र के रूप में उभरा एसआइआर

राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे और भी तेज होता नजर जा रहा है. यह अब सिर्फ चुनावी बयानबाजी तक सीमित न रहकर, जमीनी स्तर पर लगातार लोगों को लामबंद करने के रूप में सामने आ रहा है और इस बदलती हुई पहचान की राजनीति में एसआइआर की प्रक्रिया एक अहम टकराव का मुद्दा बनकर उभरी है.

कोलकाता.

राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे और भी तेज होता नजर जा रहा है. यह अब सिर्फ चुनावी बयानबाजी तक सीमित न रहकर, जमीनी स्तर पर लगातार लोगों को लामबंद करने के रूप में सामने आ रहा है और इस बदलती हुई पहचान की राजनीति में एसआइआर की प्रक्रिया एक अहम टकराव का मुद्दा बनकर उभरी है. मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की कवायद और गहरी वैचारिक उथल-पुथल का मेल चुनावी रणक्षेत्र को एक बहुस्तरीय मुकाबले में बदल रहा है, जहां मतदाताओं का गणित पहचान-आधारित लामबंदी से टकराता है. वर्ष 2021 में जहां मतभेद नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के इर्द-गिर्द केंद्रित थे.

वहीं, अब उभरती हुई प्रतिस्पर्धा एक ऐसे मुद्दे पर आधारित है, जो यह तय करता है कि मतदाता के रूप में कौन योग्य है. एसआइआर की प्रक्रिया ध्रुवीकरण को चुनावी बयानबाजी से बदल कर चुनावी वैधता को लेकर एक सीधी लड़ाई में तब्दील कर रही है, जिसके साथ घुसपैठ और ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ जैसे बार-बार दोहराये जाने वाले विषय जुड़े हैं. एसआइआर की प्रक्रिया के दौरान, अब तक मतदाता सूची से लगभग 64 लाख नाम हटाये जा चुके हैं, और कई लाख अन्य नामों की अभी भी जांच जारी है.

यह एक ऐसा पैमाना है, जिसने राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है और कड़े मुकाबले वाली सीटों पर अनिश्चितता पैदा कर दी है. भाजपा ने एसआइआर को एक जरूरी चुनाव सुधार के तौर पर पेश किया है, और इसे अवैध प्रवासन व जनसांख्यिकीय बदलाव-खास तौर पर सीमावर्ती जिलों से संबंधित चिंताओं से जोड़ा है.

केंद्रीय मंत्री डाॅ सुकांत मजूमदार ने कहा : सीमावर्ती जिलों में अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय बदलाव वास्तविक चिंताएं हैं. ये मुद्दे राज्य की पहचान और सुरक्षा को प्रभावित करते हैं.

तृणमूल कांग्रेस के नेता फिरहाद हकीम ने कहा : भाजपा अल्पसंख्यकों के वोट देने के अधिकार छीनकर चुनाव लड़ना चाहती है. हम चुनावी फायदे के लिए ध्रुवीकरण की इजाजत नहीं देंगे.

राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य ने कहा : 2021 में, चुनावी अभियान के दौरान ध्रुवीकरण अपने चरम पर था. अब हम जो देख रहे हैं, वह एक ज्यादा स्थायी और जमीनी स्तर की लामबंदी है, तथा एसआइआर ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है. कुल मिलाकर, एसआइआर और पहचान-आधारित लामबंदी में आयी तेजी ने बंगाल में राजनीतिक व्याकरण को पूरी तरह से बदल दिया है. इसने 2026 के विधानसभा चुनाव को केवल शासन-प्रशासन का ही नहीं, बल्कि इस बात का भी एक बेहद अहम मुकाबला बना दिया है कि मतदाता की पहचान कौन तय करता है और मतदाताओं को कौन लामबंद करता है.

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By BIJAY KUMAR

BIJAY KUMAR is a contributor at Prabhat Khabar.

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