कोलकाता
. कच्चे जूट संकट को लेकर इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन (आइजेएमए) के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह से मुलाकात कर गंभीर चिंता जतायी. यह बैठक उत्तर 24 परगना जिले के बैरकपुर स्थित आइसीएआर–सीआरआइजेएफ में स्थापना दिवस की पूर्व संध्या पर हुई. बैठक में आइजेएमए के चेयरमैन राघव गुप्ता और सदस्य संजय कजारिया शामिल रहे. बैठक के दौरान आइजेएमए ने केंद्रीय मंत्री को प्रस्ताव दिया कि 31 मार्च 2026 तक निजी व्यापारियों के पास मौजूद कच्चे जूट का स्टॉक शून्य किया जाये और इसके बाद कच्चे जूट के निजी व्यापार को अवैध घोषित किया जाये. प्रतिनिधियों ने बताया कि वर्तमान में करीब 25 से 30 लाख गांठ कच्चा जूट जमाखोरी में फंसा हुआ है, जिसके कारण कच्चे जूट की कीमतें 13,000 रुपये प्रति क्विंटल का आंकड़ा पार कर चुकी हैं. इससे लाखों जूट श्रमिकों का रोजगार खतरे में पड़ गया है. आइजेएमए के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने जूट आयुक्त कार्यालय और जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (जेसीआइ) को शीघ्र कार्रवाई के निर्देश दिये. उन्होंने संकेत दिया कि जमाखोरों और सट्टेबाजों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जायेंगे.कच्चे जूट की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी
कच्चे जूट की बाजार कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही है और यह 13,000 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच गयी है. हालांकि इस बढ़ोतरी का लाभ जूट किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है. जानकारी के अनुसार, पिछले वर्ष बड़ी संख्या में किसानों ने जूट की खेती छोड़ दी थी, क्योंकि उन्हें लगातार दो सीजन न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम पर फसल बेचनी पड़ी. वर्ष 2023-24 और 2024-25 में सरकार ने कच्चे जूट का एमएसपी क्रमशः 5,050 रुपये और 5,335 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया था, जिसके बाद जेसीआइ ने खरीद अभियान चलाया. बावजूद इसके, इसका लाभ अधिकांश किसानों तक नहीं पहुंच सका. बताया गया है कि जेसीआइ के लगभग 110 खरीद केंद्र कुल उत्पादन का केवल आठ प्रतिशत ही खरीद पाए, जबकि शेष 92 प्रतिशत किसानों को महीनों तक 4,700 से 4,900 रुपये प्रति क्विंटल के दाम पर व्यापारियों को अपनी फसल बेचनी पड़ी, जो एमएसपी से 400 से 600 रुपये कम था.पहले भी राज्य सरकार से की जा चुकी है मांग
गौरतलब है कि इससे पहले भी आइजेएमए ने इस मुद्दे पर पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि वे इस प्रस्ताव को केंद्रीय कपड़ा मंत्री के समक्ष प्रभावी ढंग से उठायें. साथ ही बांग्लादेश से कच्चे जूट के निर्यात पर प्रतिबंध, सस्ते तैयार जूट उत्पादों के आयात पर नियंत्रण और भारत से जूट बीज के निर्यात पर सख्त नीतिगत कदम सुनिश्चित कराने की मांग की गयी थी. आइजेएमए का कहना है कि यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं करती हैं, तो जूट पट्टी में कीमतों की अस्थिरता, मिलों की बंदी तथा किसानों और मजदूरों का जूट से पलायन और गहराने की आशंका है.