आर्थिक संकट में एचएमसी, राजस्व लक्ष्य का 40 % भी नहीं हुआ हासिल

प्रशासनिक अनिश्चितता के बीच निगम गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहा है.

सात वर्षों से निगम चुनाव लंबित, कर्मचारियों के वेतन पर भी संकट के बादल हावड़ा. राज्य सरकार के कारण बीते सात वर्षों से हावड़ा नगर निगम (एचएमसी) का चुनाव लंबित है. इसका सीधा असर निगम की कार्यप्रणाली और शहर की बुनियादी सुविधाओं पर पड़ रहा है. प्रशासनिक अनिश्चितता के बीच निगम गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहा है. हालात ऐसे हैं कि मौजूदा वित्तीय वर्ष में निगम विभिन्न विभागों से होने वाली आय में अपने निर्धारित लक्ष्य का 40 प्रतिशत भी हासिल नहीं कर सका. निगम की बदहाल माली स्थिति का असर शहर की सूरत पर साफ दिखाई दे रहा है. टूटी-फूटी सड़कें, जगह-जगह कचरे का अंबार, जर्जर नालियां और अवैध पार्किंग हावड़ा की पहचान बन चुके हैं. यह स्थिति तब है, जब पिछले वर्ष नबान्न में हुई प्रशासनिक बैठक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं हावड़ा शहर की बदहाली पर चिंता जाहिर की थी. उन्होंने सड़कों की खराब हालत, अवैध पार्किंग और जल-जमाव को लेकर नाराजगी भी जतायी थी. निगम सूत्रों के अनुसार, सात वर्षों से निर्वाचित बोर्ड न होने के कारण निगम की माली हालत लगातार बिगड़ती जा रही है. बताया जाता है कि हावड़ा नगर निगम के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब निगम का खजाना लगभग खाली हो गया है. जानकारी के मुताबिक, मौजूदा वित्तीय वर्ष में प्रॉपर्टी टैक्स, म्यूटेशन, लाइसेंस और बिल्डिंग विभाग से होने वाली आय लक्ष्य के 40 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंच सकी. निगम अधिकारियों का कहना है कि पिछले 30 वर्षों में खजाने की ऐसी हालत कभी नहीं हुई. स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अगले वित्त वर्ष में तीन हजार से अधिक अस्थायी कर्मचारियों के वेतन भुगतान पर भी संशय बना हुआ है. निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि वर्तमान में निगम की अपनी कोई ठोस आय नहीं है और राज्य सरकार से आवंटित राशि के सहारे ही किसी तरह खर्च चलाया जा रहा है. उन्होंने बताया कि चालू वित्त वर्ष में बिल्डिंग विभाग के कई इंजीनियर सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जिससे विभाग का कामकाज लगभग ठप हो गया है और राजस्व संग्रह पर सीधा असर पड़ा है. यही स्थिति अन्य विभागों की भी है. इसके अलावा तकनीकी कारणों से ऑनलाइन भुगतान सेवा बाधित होने के कारण लाइसेंस, म्यूटेशन और प्रॉपर्टी टैक्स से होने वाली आय में भारी गिरावट आयी है. अधिकारियों का मानना है कि निगम की इस दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह सात वर्षों से निगम चुनाव न होना है. राज्य के शहरी विकास विभाग पर हावड़ा नगर निगम के प्रति उदासीन रवैया अपनाने का आरोप भी लगाया जा रहा है. पिछले सात वर्षों में निगम आयुक्त और चेयरमैन कई बार बदले गये, जिसके कारण अनेक विकास योजनाएं अधर में लटकी हुई हैं. निगम की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विभिन्न विभागों में रिक्त पदों पर नियुक्ति करने के बजाय शहरी विकास विभाग ने केएमडीए से आठ इंजीनियर और अधिकारियों को निगम में काम करने के लिए भेजा है. ये अधिकारी दोनों संस्थाओं का कार्यभार संभाल रहे हैं. राजस्व संग्रह की जिम्मेदारी कमजोर पड़ चुकी है. सड़क निर्माण और मरम्मत का दायित्व निगम को मिलने के बजाय केएमडीए को सौंपा जा रहा है. पेयजल आपूर्ति का कार्य पहले ही केएमडीए को दिया जा चुका है. विभाग जहां केएमडीए को करोड़ों रुपये का फंड उपलब्ध करा रहा है, वहीं निगम को अपेक्षित वित्तीय सहायता नहीं मिल पा रही है. परिणामस्वरूप निगम का खजाना लगातार खाली होता जा रहा है.

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By GANESH MAHTO

GANESH MAHTO is a contributor at Prabhat Khabar.

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