कोलकाता में जलवायु संकट गहराया : हर दो में एक बच्चा श्वसन रोग से है प्रभावित

कोलकाता में बढ़ते जलवायु परिवर्तन का असर अब गंभीर रूप से स्वास्थ्य पर दिखायी देने लगा है. शहर की मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. रनिता सेनगुप्ता ने कहा कि महानगर में हर दो में से एक बच्चा श्वसन संबंधी बीमारियों से जूझ रहा है.

सीएमएचओ ने जतायी चिंता, तापमान में 2.7 डिग्री वृद्धि; डेंगू-मलेरिया जैसे वेक्टर जनित रोगों का खतरा बढ़ा

संवाददाता, कोलकाता

कोलकाता में बढ़ते जलवायु परिवर्तन का असर अब गंभीर रूप से स्वास्थ्य पर दिखायी देने लगा है. शहर की मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. रनिता सेनगुप्ता ने कहा कि महानगर में हर दो में से एक बच्चा श्वसन संबंधी बीमारियों से जूझ रहा है. उन्होंने इसे अर्बन वार्मिंग और बदलते मौसम पैटर्न का प्रत्यक्ष परिणाम बताया.

डॉ. सेनगुप्ता गुरुवार को कोलकाता नगर निगम और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रही थीं. कार्यक्रम में ‘कोलकाता क्लाइमेट एक्शन प्लान’ के तहत जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों, विशेषकर बच्चों पर इसके असर, पर विस्तृत चर्चा हुई. उन्होंने बताया कि पिछले सात दशकों से शहर अर्बन वार्मिंग की समस्या झेल रहा है, जिससे तापमान में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है. बदलते जलवायु चक्र के कारण वर्षा का पैटर्न भी प्रभावित हुआ है, जिसके चलते वेक्टर जनित बीमारियों-डेंगू, चिकनगुनिया, जीका, मलेरिया और जापानी एन्सेफलाइटिस के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है.

कार्यक्रम में मौजूद यूनिसेफ पश्चिम बंगाल के प्रमुख डॉ. मंजूर हुसैन ने बताया कि कोलकाता के तापमान में पिछले 70 वर्षों में लगभग 2.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गयी है. उन्होंने कहा कि बढ़ता तापमान और वायु प्रदूषण केवल कोलकाता ही नहीं, बल्कि भारत और दुनिया के कई बड़े शहरों के लिए चिंता का विषय है.

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ठोस शहरी नीतियों, जागरूकता और स्वास्थ्य अवसंरचना को मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि खासकर बच्चों को इसके दुष्प्रभावों से बचाया जा सके.

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