ड्रग्स मामलों में लापरवाही बरतने वाले 17 पुलिस अधिकारियों पर होगी कार्रवाई

राज्य में मादक पदार्थ से जुड़े मामलों की जांच में लापरवाही की घटना सामने आने के बाद कलकत्ता हाइकोर्ट ने विभिन्न जिलों के 17 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का निर्देश दिया है. हाइकोर्ट ने इन अधिकारियों को कम से कम छह महीने के लिए पुलिस ट्रेनिंग स्कूल भेजने का आदेश दिया है, ताकि उन्हें ड्रग्स से जुड़े मामलों की उचित जांच प्रक्रिया का विशेष प्रशिक्षण दिया जा सके.

कोलकाता.

राज्य में मादक पदार्थ से जुड़े मामलों की जांच में लापरवाही की घटना सामने आने के बाद कलकत्ता हाइकोर्ट ने विभिन्न जिलों के 17 पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का निर्देश दिया है. हाइकोर्ट ने इन अधिकारियों को कम से कम छह महीने के लिए पुलिस ट्रेनिंग स्कूल भेजने का आदेश दिया है, ताकि उन्हें ड्रग्स से जुड़े मामलों की उचित जांच प्रक्रिया का विशेष प्रशिक्षण दिया जा सके. प्रशिक्षण में सफल हुए अधिकारियों को ही भविष्य में ऐसे मामलों की जांच या छापेमारी में शामिल किया जायेगा.

तीन साल पहले शुरू हुई यह समस्या, तब उजागर हुई, जब कई ड्रग्स मामलों की सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारी अदालत में आरोपितों को पहचानने में असमर्थ रहे. यह सामान्य भूल नहीं थी, बल्कि हाइकोर्ट ने इसे षड्यंत्र या जान-बूझकर भूलने की प्रवृत्ति के रूप में देखा और सभी ऐसे मामलों को एक साथ जोड़ कर सुनवाई शुरू की.

डोमकल, भीमपुर, चाकुलिया सहित कई थानों के मामलों में एक जैसी स्थिति देखी गयी, जहां जिस अधिकारी ने आरोपी को गुप्त सूचना के आधार पर गिरफ्तार किया था, वही अधिकारी ट्रायल के दौरान आरोपी को पहचान नहीं पाया. इस गंभीर चूक को देखते हुए हाइकोर्ट ने 2023 में ही सख्त कदम उठाने के संकेत दे दिये थे.

राज्य पुलिस ने हाइकोर्ट के निर्देश पर संबंधित जिलों नदिया, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर के मामलों की समीक्षा कर रिपोर्ट पेश की. इस रिपोर्ट में सात मामलों से जुड़े 17 अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया. उनके खिलाफ विभागीय जांच के साथ-साथ एक-एक पदोन्नति भी रोकी गयी है.

डीजीपी व कोलकाता पुलिस आयुक्त को भी किया सतर्क

हाइकोर्ट में न्यायमूर्ति अजय कुमार मुखर्जी की बेंच ने स्पष्ट किया कि भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही पर कड़ा एक्शन लिया जायेगा. इसी के तहत राज्य पुलिस प्रमुख (डीजीपी) और कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने सभी थानों को चेतावनी जारी की है. इस मामले में हाइकोर्ट में कार्यरत कई सरकारी वकीलों ने जिले स्तर पर कार्यरत सरकारी अभियोजकों की भूमिका पर भी सवाल उठाये हैं. उनका कहना है कि अक्सर मुकदमे की सुनवाई में 10 से 15 साल तक का वक्त लग जाता है, तब तक पुलिस अधिकारी कई जगहों पर स्थानांतरित हो चुके होते हैं और आरोपियों की शक्ल-सूरत में भी बदलाव आ जाता है. ऐसे में ट्रायल से पहले अभियोजन पक्ष का यह दायित्व है कि वह गवाहों को सारी जानकारी फिर से याद दिलाये, जिससे ऐसी भूल न हो.

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Published by: Bijay kumar

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