ममता बनर्जी सरकार में शिक्षकों की कमी और फंड मिसमैनेजमेंट से बिगड़ी शिक्षा व्यवस्था, CAG की रिपोर्ट में खुलासा

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर किया है. शिक्षकों की भारी कमी, फंड का सही उपयोग न होना और छात्रों का बड़ी संख्या में पढ़ाई छोड़ना चिंता का विषय है. रिपोर्ट में आर्थिक तंगी, रुचि की कमी और बाल विवाह जैसे कारणों से बच्चों की शिक्षा पर पड़े असर का भी विश्लेषण किया गया है.

ममता बनर्जी के शासनकाल में पश्चिम बंगाल में स्कूली शिक्षा व्यवस्था क्यों बिगड़ी, इसका खुलासा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट से हुआ है. इसमें कहा गया है कि वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच राज्य में संचालित ‘समग्र शिक्षा’ योजना की प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में विद्यार्थियों के बड़ी संख्या में पढ़ाई छोड़ने, शिक्षकों की किल्लत और केंद्र से मिले बजट का पूरा उपयोग न होने के कारण योजना का क्रियान्वयन बुरी तरह प्रभावित हुआ.

6 जिलों में ड्रॉपआउट बच्चों पर स्पेशल सर्वे

ऑडिट टीम ने 6 जिलों के 21 हाई स्कूल के 581 ड्रॉपआउट बच्चों पर एक विशेष सर्वेक्षण किया. इसमें सामने आया कि 53 प्रतिशत मामलों में आर्थिक तंगी के कारण अभिभावकों ने बच्चों को स्कूल से निकाला, 14 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई में रुचि नहीं रही, 13 प्रतिशत परिवारों के काम के सिलसिले में पलायन करने और 12 प्रतिशत मामलों में कम उम्र में विवाह (बाल विवाह) के कारण बच्चों की शिक्षा अधूरी रह गयी.

520 स्कूलों में शिक्षक नहीं, आरटीई नियमों का उल्लंघन

कैग की रिपोर्ट में सरकारी स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात और नियुक्तियों को लेकर भी प्रशासनिक कमियां उजागर हुई हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के 8 प्रतिशत यानी 5,152 स्कूल ऐसे मिले, जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे थे. इससे 1,76,491 विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हुआ. 520 स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं था, जिससे 8,596 छात्र प्रभावित हुए.

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शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के नियमों के उल्लंघन का भी मामला सामने आया है. 150 से कम विद्यार्थियों वाले 40,530 स्कूलों में प्रधान शिक्षक तैनात थे. प्राथमिक स्तर पर 31,684 और उच्च प्राथमिक स्तर पर 2,058 शिक्षकों की कमी दर्ज की गयी, जबकि 79 प्रतिशत उच्च माध्यमिक स्कूलों में निर्धारित शिक्षक-छात्र अनुपात से अधिक संख्या थी.

फंड का सही उपयोग नहीं, 395 करोड़ रुपए वापस करने पड़े

वित्तीय प्रबंधन पर उंगली उठाते हुए कैग ने कहा कि 5 वर्षों के दौरान योजना के तहत उपलब्ध धन में से मात्र 46 से 65 प्रतिशत का ही उपयोग हो पाया. केंद्र और राज्य सरकार द्वारा समय पर राशि जारी न करने और निर्माण कार्यों में देरी ने वित्तीय अनुशासन को बिगाड़ा. स्वीकृत बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) काम समय पर पूरा न होने के कारण स्कूलों के विकास के लिए मिले 395 करोड़ रुपए सरेंडर करने पड़े. कार्य में ढिलाई के कारण केंद्र से मिलने वाली 2,428 करोड़ रुपए की सहायता भी प्रभावित हुई. इससे समग्र शिक्षा का दायरा सीमित हो गया.

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राज्य शिक्षा विभाग ने दी ये सफाई

कैग की रिपोर्ट पर राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग ने अगस्त 2025 में अपना स्पष्टीकरण जारी किया था. विभाग ने तर्क दिया था कि उच्च कक्षाओं में दाखिले कम होने का मुख्य कारण यह है कि कई छात्र माध्यमिक परीक्षा पास करने के बाद परिवार को आर्थिक रूप से सहयोग देने के लिए काम करना शुरू कर देते हैं या फिर रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों में चले जाते हैं.


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By मिथिलेश झा

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