77 वर्षों से पेन का ‘पेन’ दूर कर रहा एक ‘हॉस्पिटल’

कभी अधिकतर लोगों की जेब में पेन (कलम) हुआ करती थी. 1980 के दशक में भारतीय बाजारों में बॉल पेन की एंट्री से पहले तक मुख्य रूप से फाउंटेन पेन ही चलन में थी. ऐसी कलमें दवात बंद स्याही से चलती थीं.

By Prabhat Khabar News Desk | March 4, 2025 1:54 AM

1948 में कोलकाता के एस्प्लेनेड में हुई थी पेन हॉस्पिटल की स्थापना, यहां ‘मरीज’ लेकर आते हैं डॉक्टर, जज व वकील भीविकास कुमार गुप्ता, कोलकाता कभी अधिकतर लोगों की जेब में पेन (कलम) हुआ करती थी. 1980 के दशक में भारतीय बाजारों में बॉल पेन की एंट्री से पहले तक मुख्य रूप से फाउंटेन पेन ही चलन में थी. ऐसी कलमें दवात बंद स्याही से चलती थीं. तब उपयोगकर्ता पेन के अतिरिक्त अलग से स्याही खरीदते. फिर बॉल पेन का जमाना आ गया. इनके लिए अलग से भी रिफिल होती है. लेकिन, अब डिजिटल युग में पेन का इस्तेमाल ही कम होता जा रहा है. आज छोटी-मोटी बातें लोग मोबाइल फोन में ही नोट कर लेते हैं. हालांकि आज भी कलम या पेन प्रेमी मिल ही जाते हैं. अगर यह कहा जाये कि कुछ कलम प्रेमियों में पेन से ऐसा लगाव पाया जाता है कि वे नयी खरीदने के बजाय पुरानी की मरम्मत कराना ही पसंद करते हैं, तो आज के लिखने-पढ़ने वाले अधिकतर लोग भरोसा ही नहीं करेंगे. पर, यह सही है. ऐसे ही कलम प्रेमियों के हित में कोलकाता के एस्प्लेनेड (धर्मतला) में कलमों की मरम्मत के लिए करीब आठ दशक पहले एक वर्कशॉप खुला था, जिसे लोग पेन हॉस्पिटल के नाम से जानते हैं. यहां आम लोगों के अतिरिक्त जज, वकील, नेता, अभिनेता, डॉक्टर, प्रोफेसर और ऑफिसर बीमार (खराब) हो चुकी अपनी पसंदीदा कलमों को ठीक कराने आते हैं. एस्प्लेनेड में डोरिना क्रॉसिंग के पास पीयरलेस इन होटल से सटे चौरंगी रोड पर स्थित पेन हॉस्पिटल के संचालक मोहम्मद इम्तियाज बताते हैं कि पिछले 46 वर्षों से वह खुद देश-विदेश की पुरानी, कीमती और लगभग दुर्लभ हो चुकी कलमों की मरम्मत कर रहे हैं. उनके अनुसार, इस संस्थान की शुरुआत वर्ष 1948 में उनके दादा मोहम्मद शमसुद्दीन ने की थी. तब से यह पेन हॉस्पिटल निरंतर कलम प्रेमियों की सेवा कर रहा है. वह बताते हैं कि उनके पास मरम्मत के लिए बड़े-बड़े ब्रांड की कीमती कलमें रुग्णावस्था में लायी जाती हैं. अधिकतर ऐसी होती हैं, जिनसे ग्राहक यानी उनके उपयोगकर्ता दिल से जुड़े होते हैं. अतीत की कुछ अनोखी और संवेदनशील घटनाओं के जरिये. इम्तियाज बताते हैं कि कई ग्राहकों के चेहरों पर तो खराब हो चुकी पेन के साथ उनके गहरे भावनात्मक लगाव को पढ़ा भी जा सकता है. बहुत आसानी से. कुछ मामलों में पेन हॉस्पिटल पहुंचने वाली कलम अपने उपयोगकर्ताओं के प्रियजनों की खास या आखिरी निशानी होती हैं. मोहम्मद इम्तियाज कहते हैं, ‘जब उनकी पेन को सक्सेसफुली रिपेयर कर देता हूं, तो उनके चेहरे की खुशी देखते ही बनती है. उनके मुख-मंडल पर तैरती प्रसन्नता से मेरे मन को भी काफी सुकून मिलता है.’ कई बार महीना भी लग जाता है मरम्मत में : कोलकाता के इस पेन हॉस्पिटल वाले इम्तियाज के मुताबिक, पेन मरम्मत के काम में एक सप्ताह से एक महीने तक का भी समय लग जाता है. कभी-कभी इससे भी ज्यादा. इनके यहां आने वाले जर्मनी, इंग्लैंड, जापान, अमेरिका, इटली, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, ताइवान और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में निर्मित महंगी कलमें ठीक कराने आते हैं. पेन हॉस्पिटल में पार्कर 51, पायलट नामिकी, लैमी, शीफर, पार्कर वैक्यूमैटिक, वाटरमैन और क्रॉस जैसे बड़े ब्रांड की कलमें इलाज (मरम्मत) के लिए लायी जाती हैं. अमूमन इनकी कीमतें कुछ सौ रुपयों से लेकर लाखों तक में होती हैं. वे करुण भाव से हाथ जोड़ बोलते हैं – प्लीज, इसे ठीक कर दीजिए ना : मोहम्मद इम्तियाज कहते हैं कि उनके पास अक्सर ऐसे लोग आते हैं, जिनकी पेन से कुछ खास यादें जुड़ी होती हैं. वे हर हाल में पेन की मरम्मत चाहते हैं. मरम्मत की गारंटी हो सके, इसके लिए वे हाथ भी जोड़ते रहते हैं. करबद्ध हो कहते हैं, ‘प्लीज, इसे ठीक कर दीजिये ना. किसी तरह दुरुस्त कर दीजिये. आपका बड़ा उपकार होगा मुझ पर.’ आगे वह कहते हैं, ‘जब मैं ऐसे ग्राहकों की कलमें दुरुस्त कर उन्हें लौटता हूं, तो उनके चेहरे पर बिखरी खुशी देख मैं खुद भी अभिभूत हो जाता हूं. उस अनुभूति को शब्दों में बयां कर पाना संभव नहीं.’

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