डगर के साथी हमें तुम याद रखना, तुम याद रखना...

कोलकाता: संवेदना और अनुभूति जब गुनगुनाहट बन कर शब्दों में प्रकट होती है तब वह कविता बन जाती है. भाव का भाषा से मिलन ही कविता का प्राकट्य है. यह हृदय की अनुभूतियों की ईमानदार अभिव्यक्ति है. ये बातें भारतीय संस्कृति संसद में मेरी दृष्टि मेरी सृष्टि व्याख्यानमाला में राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने कही. वह […]

कोलकाता: संवेदना और अनुभूति जब गुनगुनाहट बन कर शब्दों में प्रकट होती है तब वह कविता बन जाती है. भाव का भाषा से मिलन ही कविता का प्राकट्य है. यह हृदय की अनुभूतियों की ईमानदार अभिव्यक्ति है. ये बातें भारतीय संस्कृति संसद में मेरी दृष्टि मेरी सृष्टि व्याख्यानमाला में राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने कही. वह अपनी कविताओं की पुनरावृति सुन कर भावुक हो उठे. खास कर ‘जब डगर के साथी हमें तुम याद रखना’ की बच्चों ने भावमय प्रस्तुति दी.

उन्होंनें कहा कि अपनी कविताओं को दूसरे के मुंह से सुनना अभिभूत करनेवाला है. हर रचनाकार की सृष्टि के पीछे कुछ विचार होता है. रचना के पीछे की पृष्ठभूमि होती है. कविता क्या है, हम जो देखते सुनते और अनुभव करते हैं उसी की प्रतिक्रिया का नाम कविता है. सृष्टि और दृष्टि दोनों हमारे देखने के ढंग पर निर्भर करती हैं.
हमारे अंदर एक तीसरी आंख होती है. यह हृदय है जो देखता, सुनता व आभास करता है. महामहिम ने वर्तमान समय में हमारी साहित्यिक व सांस्कृतिक अस्मिता पर आक्रमण के आक्रोश को एक नया अर्जुन चाहिए के माध्यम से प्रकट करते हुए कहा कि नयी पीढ़ी को हमारे देश की गौरवशाली अतीत के बारे में जागरूक करने की आवश्यकता है.
इस अवसर पर संस्कृति संसद के अध्यक्ष विठ्ठल दास मूंधरा ने स्वागत भाषण देते हुए श्री त्रिपाठी की आत्मीयता का जिक्र किया. वहीं कार्यक्रम का सफल संचालन व निर्देशन तारा दूगड़ ने किया. वहीं वसुंधरा दूगड़, सचिव विजय झुनझुनवाला, नर नारायण हरलालका ने राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी को शॉल व श्रीफल प्रदान किया.

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