कोलकाता/पोर्ट ब्लेयर : द्वीपों के सबसे पुराने गैर राजनीतिक संगठन लोकल बाॅर्न एसोसिएशन और उसके सहयोगी संगठनों की ओर से द्वीपों में इन्नरलाइन परमिट लागू करने के संबंध में छह सितंबर को, जो अंडमान बंद का आह्वान किया गया है,
उसी के सिलसिले में सांसद भवन में आयोजित एक पत्रकार सम्मेलन के दौरान द्वीपों के सांसद विष्णु पद रे ने अंडमान बंद नहीं करने की अपील करते हुए कहा कि यह बंद पूरी तरह से असंवैधानिक है और द्वीपों की जनता इससे अपने आपको दूर रखे. उन्होंने एक राष्ट्र और एक संविधान की बातों का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रदेश में इन्नरलाइन परमिट लागू है, वह प्रदेश विकास के मामले में पिछड़ा हुआ है. जम्मू-कश्मीर के लेह और मेघालय का जिक्र करते हुए कहा कि वहां से भी इन्नरलाइन परमिट को समाप्त कर दिया गया है.
उन्होंने कहा कि 1896 में अंग्रेजों द्वारा भी इस द्वीप समूह में भी इसी तरह का कानून लागू किया गया था, जिसके अंतर्गत जिला उपायुक्त द्वारा इन्नरलाइन परमिट जारी की जाती थी
लेकिन 1950 में जैसे ही इस देश को गणतंत्र राज्य घोषित किया गया, वैसे ही इस कानून को यहां से समाप्त कर दिया गया. जहां तक जनसंख्या प्रवाह का सवाल है तो समय-समय पर समिति का गठन किया जाता रहा है और शेखर सिंह आयोग के द्वीप फोटो पहचान पत्र को ही मान्यता दी गयी है, लेकिन जब जब इन्नरलाइन परमिट का मामला आया, तब-तब इसे रद्द कर दिया गया. यहां तक कि इस संबंध में गठित एक समिति के वरिष्ठ सदस्य और सीपीएम नेता सीताराम येचुरी भी इन द्वीपों में इन्नरलाइन परमिट लागू करने के खिलाफ थे.
जब उनसे पूछा गया कि पिछले आम चुनाव में भाजपा के घोषणापत्र में इन्नरलाइन की बात का उल्लेख किया गया था, तो उन्होंने इस सवाल का गोल-मटोल जवाब दिया, जिससे पत्रकारों को काफी हैरानी हुई.
सांसद बार-बार इस बात की दुहाई देते रहे कि भाजपा के कार्यकाल में जितना विकास हुआ, वैसा कभी नहीं हुआ. इसके अलावा उन्होंने सोनिया और राहुल गांधी पर यह आरोप लगाया कि दक्षिणी अंडमान के अधिकतर गांव और मध्योत्तर अंडमान के कुछ गांवों को बफरजोन के अंतर्गत लागू करके एक तरह से मामले को पेचीदा बना दिया गया है और इसका अच्छा-खासा प्रभाव दक्षिणी अंडमान से मध्योत्तर अंडमान के बीच राजमार्ग के विस्तार पर देखा जा रहा है.
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि सांसद की ही पार्टी का एक गुट इन्नरलाइन परमिट लागू करने के संबंध में मैदान में कूद पड़ा है और वहीं पर इस बंद को असंवैधानिक बताना कहां तक जायज है? अब इस सवाल का जवाब जनता को ही आगामी आम चुनाव में देना होगा.
