कोलकाता : विश्व बाजार में इतनी होड़ है कि वसुधैव कुटुम्बकम आम जनता की आवाज बनने जा रही है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने वन, पर्वत, पेड़, पौधों, नदी तालाब को वस्तु में बदल दिया है. उनका जंगल पर कब्जा धरती के फेफड़े पर कब्जा करना है और इसके सबसे ज्यादा शिकार आदिवासी हो रहे हैं. वैश्वीकरण ने और कुछ नहीं, बस लालच को भगवान बना दिया है.
गुरुवार को भारतीय भाषा परिषद में ये बातें मानवाधिकार कर्मी और चिंतक स्वामी अग्निवेश ने कहीं. ग्लोबल विलेज बरक्स वसुधैव कुटुंबकम् विषय पर आयोजित कार्यक्रम में ऋग्वेद के उस श्लोक से उन्होंने अपने व्याख्यान की शुरुआत की, जिसमें कहा गया है कि साथ मिलकर चलो और साथ मिलकर सोचो. उन्होंने कहा कि दुनिया में 1700 बिलियन डॉलर सैनिक-साजो सामान पर खर्च हो रहे हैं.
यदि इसका 10 प्रतिशत भी गरीब बच्चों पर खर्च हो, तो 21 हजार बच्चे हर साल भूख से मरने से बच जायेंगे. भारतीय भाषा परिषद और जातीय समचिंतन के इस संयुक्त आयोजन में परिषद की अध्यक्ष डॉ कुसुम खेमानी ने अतिथियों का स्वागत किया. अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ शंभुनाथ ने कहा कि दयानंद सरस्वती ने तर्क की जो परंपरा 19वीं सदी में स्थापित की थी, वह आज बढ़ती हिंसा और सस्ते मनोरंजन की वजह से खतरे में है.
हमें सभ्य समाज बनाने के लिए तर्क और निर्भीक बहस की उस परंपरा की फिर से स्थापना करनी होगी. सभा को गांधीवादी विचारक डॉ शंकर कुमार सान्याल और मनोहर मानव ने भी संबोधित किया. सभा का संचालन और धन्यवाद ज्ञापन बंगवासी कॉलेज के पीयूष कांत राय ने किया
