कोलकाता : किसी शायर ने ठीक ही कहा है कि मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके हौसलों में जान होती है. पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है. संघर्षमय जिंदगी की असल जंग जितने वाली कोलकाता की दिव्यांग अदिति दासगुप्ता भी कुछ ऐसा ही कारनामा कर दिखाई. अदिति के जीवन की भी कुछ ऐसी ही कहानी है.
दिव्यांग होते हुए भी अदिति अपनी जिंदगी में मुश्किलों के पहाड़ को अपने चट्टानों जैसे बुलंद इरादे व हौसले से तोड़कर कामयाबी की पहाड़ पर जा पहुंची. पंद्रह सालों तक लगातार इतनी खामोशी से लगन से मेहनत की कि उसकी कामयाबी ने आज कोहराम मचा दिया. मंगलवार को अदिति को आइसीएआइ ने सर्टिफिकेशन ऑफ एम्पावर्ड विमेन के सम्मान से नवाजा गया.
क्या है अदिति की कहानी
कोलकाता के बालीगंज की रहनेवाली अदिति दासगुप्ता का जन्म 18 जनवरी 1980 में हुआ. पिता का नाम रथिंद्रनाथ दासगुप्ता और मां का नाम छाया दासगुप्ता है. अदिति अभी आइसीएआइ की वर्तमान डेपुटी डॉयरेक्टर है. घटना की रात 1994 में वह मात्र 14 साल की थी, जब उसके सारे मेमोरी ही जिंदगी से मिट गयी थी.
अचानक पैर-हाथ चलना बंद हो गया था और तेज बुखार के साथ उसे गुलेन बारी सिंड्रम नामक बीमारी हो गयी थी, जिसका शिकार होने के बाद नौ माह तक वह वेंटिलेशन पर थी और उसके बाद आज तक दिव्यांग के रूप में जिंदगी जी रही है. उसके शरीर के हाथ और पैर सही से काम नहीं करते लेकिन इसके बावजूद अपनी जिंदगी की कई परीक्षाओं से गुजर कर विषम पस्थितियों से होकर आज मुकाम हासिल की है.
ये है कैरियर की उड़ान
बीमारी के कारण जब उसके सारे पुराने मेमोरी डिलीट हो गये थे. तब उस वक्त से उसे ए, बी, सी, डी की पढ़ाई शुरू करनी पड़ी थी लेकिन अपने उस बीते पल के समय को बहुत तेजी से कवर कर ली. धीरे-धीरे पढ़ाई करते-करते वह साउथ प्वाइंट हाई स्कूल से माध्यमिक की परीक्षा दी. फिर उच्च माध्यमिक हेम्ब्रम चंद्र कॉलेज साउथ सिटी से की. साउथ सिटी कॉलेज से बीकॉम, 2005 में सीयू से एम कॉम और 2012 में एमबीए विद्यासागर यूनिवर्सिटी से की.
इसी बीच द इंस्टिट्यूट ऑफ कॉस्ट एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आइसीएआइ) से सीएमए में 66 प्रतिशत नंबर हासिल कर दिव्यांग महिलाओं के लिए मिसाल बन गयी. हर परीक्षा में प्रथम श्रेणी से भी अधिक नंबरों से पास की. पिछले आठ-नौ साल से विश्व की दूसरी सबसे बड़ी तथा एशिया में सर्वाधिक बड़ी कॉस्ट व मैनेजमेंट एकाउंटिंग संस्था, द इंस्टिट्यूट ऑफ कॉस्ट एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आइसीएआइ) की डेपुटी डॉयरेक्टर है.
उस वक्त टूट गयी थी आस, फिर मिला साहस
जब तकदीर ने ठोकर मारी और 1994 में चौदह साल की उम्र में जिंदगीभर के लिए दिव्यांग बन गयी. तब नये सिरे से पढ़ाई शुरू करने के लिए समाज के लोग भी उसे अपने बराबर चलने से दरकिनार करने लगे थे. अदिति का कहना है कि जब वह स्कूल अथवा अन्य प्राइवेट ट्यूशनों में पढ़ने की इच्छा रखती तो उसे पढ़ाने से लोग कतराते थे. उस वक्त माता-पिता और भाई का सपोर्ट मिला. घर में ही तैयारी की और फिर धीरे-धीरे पढ़ाई की और फिर परीक्षा देकर समाज में कामयाबी की अलग पहचान बनायी.
लगन और परिश्रम से सब संभव है
अदिति का कहना है कि कोई भी कभी हार नहीं माने. जिंदगी में जितना संघर्ष है, परिणाम उतना ही बेहतर होता है. जज्बे और जुनून के साथ हौसले को लेकर आगे बढ़ें, हर मंजिल आपके कदम चूमेगी. आज के समाज के बच्चों और महिलाओं सभी को सिर्फ यही बताना चाहती हूं कि वे अपने जीवन में कभी भी किसी परिस्थिति में हार नहीं मानें. सफलता जरूर मिलेगी.
