16 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रख इसीएल के पूर्व कर्मचारी से लूटे 1.01 करोड़ रुपये
इसीएल के पूर्व कर्मचारी व अंडाल थाना क्षेत्र के उखड़ा, सुभाषपाड़ा गुरुद्वारा रोड इलाके के निवासी तरुण कुमार गराई को साइबर अपराधियों ने 16 दिनों (23 दिसम्बर 2025 से सात जनवरी 2026) तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर कुल 1,01,05,000 रुपये लूट लिये.
आसनसोल.
इसीएल के पूर्व कर्मचारी व अंडाल थाना क्षेत्र के उखड़ा, सुभाषपाड़ा गुरुद्वारा रोड इलाके के निवासी तरुण कुमार गराई को साइबर अपराधियों ने 16 दिनों (23 दिसम्बर 2025 से सात जनवरी 2026) तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर कुल 1,01,05,000 रुपये लूट लिये. श्री गराई की पत्नी हाइस्कूल की पूर्व शिक्षिका हैं, श्री गराई ने अपने और अपनी पत्नी के खाते से साइबर अपराधियो को सात किश्तों में ऊक्त राशि ट्रांसफर किया. जबतक उन्हें समझ आता तबतक काफी देर हो चुकी थी. श्री गराई ने इसकी शिकायत नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) में की और एक लिखित शिकायत साइबर क्राइम थाना आसनसोल में जमा दिया. जिसके आधार पर कांड संख्या 05/26 में बीएनएस की धारा 308(6)/316(2)/318(4)/319(2)/336(3)/338/340(2)/61(2) के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई. पुलिस के अनुसार एनसीआरपी में शिकायत होने के बाद तुरंत कार्रवाई हुई और करीब 17 लाख रुपये विभिन्न खातों में ब्लॉक किया गया है. हालांकि जबतक यह राशि श्री गराई के खाते में नहीं वापस नहीं आता, तबतक कुछ कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. इस ठगी से श्री गराई और उनकी पत्नी के रिटारमेंट के बाद मिला सारा पैसा साइबर अपराधियों ने लूट लिया. एक छोटी सी गलती से जिंदगी भर की सारी कमायी चली गयी.साइबर क्राइम के शातिरों के जाल में ऐसे फंदे तरुण गराई
श्री गराई के शिकायत के अनुसार 23 दिसम्बर 2025 को सुबह साढ़े नौ बजे उनके मोबाइल फोन पर 911482353000 नम्बर से कॉल आया. जिसमें फोन करनेवाले ने खुद को दिल्ली क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताते हुए कहा कि उनके आधार कार्ड का उपयोग करके दिल्ली में एक सिमकार्ड और केनरा लिया गया और केनरा बैंक का खाता खोला गया. उस खाते में मनी लांड्रिंग के रूप में पांच करोड़ रुपये की अवैध गतिविधियां पायी गयी है. इसके बाद एक के बाद एक फोन नम्बरों से उन्हें कॉल आने लगा. जिसमें किसी ने खुद को सीबीआइ अधिकारी, किसी ने इडी अधिकारी, किसी ने दिल्ली पुलिस का अधिकारी तो किसी ने आरबीआइ का अधिकारी बताकर उन्हें कहा कि वे आधिकारिक निगरानी में हैं.
उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को गिरफ्तारी की धमकी दी गयी. बैंक खातों के वेरिफिकेशन के बहाने सारे पैसे उनके द्वारा दिये गये खातों में ट्रासंफर करने को बाध्य किया गया. आश्वासन दिया गया कि वेरिफिकेशन के बाद पैसे वापस कर दी जायेगी. व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिये लगातार निगरानी पर रखा गया और नेशनल सीक्रेट एक्ट के हवाला देकर डर पैदा किया गया. 23 दिसम्बर से सात जनवरी तक वे बहुत ज्यादा डर, मानसिक दाबाव और ट्रॉमा के कारण अपना और अपनी पत्नी के बैंक खातों से 1.01 करोड़ रुपये साइबर ठगों के भेजे खाते में ट्रांसफर कर दिया. लेकिन जब रकम वापस नहीं आयी, तो वे समझ गये कि उनके साथ साइबर ठगी हुआ है.कैसा है मानसिक दबाव, जब अजनबी के कहने पर जिंदगीभर की कमाई सौंप देते हैं
साइबर क्राइम विभाग से जुड़े पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि डिजिटल अरेस्ट के अनेकों पीड़ितों के साथ वे विस्तार से बात करके यह जानने का प्रयास किया कि क्यों किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर वे अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी उन्हें सौंप देते हैं? लगभग हर पीड़ित का जवाब एक ही रहा कि खुद और अपने परिवार को मान-सम्मान बचाने तथा जेल जाने के डर से उनके झांसे में आ जाते हैं.
राष्ट्रीय सुरक्षा का डर इसकदर दिखाया जाता है कि अपनी पीड़ा दूसरों को नहीं बता सकते हैं और उनका कहना मनाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प उस समय कुछ भी समझ में नहीं आता. सुप्रीम कोर्ट, रिजर्व बैंक का कागजात, सीबीआइ, इडी और पुलिस के दाबाव के आगे लाचार सा लगने लगता है. बचने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं. जब सारा पैसा खत्म हो जाता है, उसके बाद देने को कुछ नहीं रहता, तो वे लोग छोड़ देते हैं. तब जाकर समझ आता कि उनके साथ ठगी हो गया. जागरूकता के अभाव में लोग फंस रहे हैं.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
