विश्वभारती ने जनजातीय समुदायों के लिए शब्दकोश विकसित किया

लुप्तप्राय भाषाओं के केंद्र, विश्वभारती ने देश की सीमांत भाषाओं के अध्ययन और विश्लेषण के लिए कोड़ा, महली और कुरुख समुदायों के लिए शब्दकोश और अन्य पुस्तकें प्रकाशित की हैं ताकि देश की भुला दी गयी भाषाओं का अध्ययन किया जा सके.

बोलपुर.

लुप्तप्राय भाषाओं के केंद्र, विश्वभारती ने देश की सीमांत भाषाओं के अध्ययन और विश्लेषण के लिए कोड़ा, महली और कुरुख समुदायों के लिए शब्दकोश और अन्य पुस्तकें प्रकाशित की हैं ताकि देश की भुला दी गयी भाषाओं का अध्ययन किया जा सके. डिक्शनरी, वेबसाइट (www.cfelvb.in) और एंड्रॉइड प्लेटफॉर्म पर मोबाइल एप्लिकेशन पर भी उपलब्ध है जिनमें बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी सहित 10 से अधिक भाषाओं को जोड़ा गया है. अपने शैक्षिक पहल के तहत केंद्र ने 19 किताबें अब तक प्रकाशित की हैं जिनमें बिरहोर समुदाय के लिए व्याकरण और पश्चिम बंगाल तथा देश के अन्य हिस्सों में भाषाई सर्वे के लिए जरूरी टूल्स शामिल हैं. इनमें से कुछ किताबों का लोकार्पण गत 12 से 13 सितंबर तक आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में किया गया.

इसका आयोजन संयुक्त रूप से नेशनल ट्राइबल रिसर्च इंस्टिट्यूट (एनटीआरआइ), नयी दिल्ली और विश्व भारती ने किया. सेमिनार का उद्घाटन विश्वभारती के कार्यवाहक कुलपति प्रोफेसर बिनय कुार सरेन ने किया. उन्होंने कहा कि जब एक आदिवासी भाषा समाप्त होती है तो कीमती मौखिक इतिहास, रिवाज और स्वदेशी ज्ञान भी समाप्त हो जाता है. एनटीआरआइ की निदेशक प्रोफेसर नुपुर तिवारी ने अपने संबोधन में आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए किये जा रहे प्रयासों के बारे में बताया. सेंटर फॉर इनडेंजर्ड लैंग्वेजेस (सीएफइएल), विश्वभारती के चेयरपर्सन प्रोफेसर मनोरंजन प्रधान अतिथियों का स्वागत करते हुए विश्वभारती की गतिविधियों में बताया, विशेषकर विश्वभारती में लुप्तप्राय भाषाओं और शोध की दिशा में हो रहे कार्यों की जानकारी दी.

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