रंगों के पर्व होली के उल्लास में डूबा दुर्गापुर

बाजार हुआ रंगों से गुलजार होली की खरीदारी पर महंगाई की मार दुर्गापुर : ऋतुराज वसंत की आगवानी करता रंगों का त्यौहार होली आ चुकी है. हर किसी पर रंगों की खुमारी छाने लगी है. जिसे देखों वही रंगीन हुआ जा रहा है. रंगों के पर्व होली के उल्लास में दुर्गापुर शहर भी पूरे देश […]

बाजार हुआ रंगों से गुलजार
होली की खरीदारी पर महंगाई की मार
दुर्गापुर : ऋतुराज वसंत की आगवानी करता रंगों का त्यौहार होली आ चुकी है. हर किसी पर रंगों की खुमारी छाने लगी है. जिसे देखों वही रंगीन हुआ जा रहा है. रंगों के पर्व होली के उल्लास में दुर्गापुर शहर भी पूरे देश के साथ डूबा हुआ है. दुकानें सज गयी हैं. लोग वैर-द्वेष मिटाकर इक-दूजे के गले मिलकर उल्लास और आपसी सद्भाव से होली का पर्व मनाने के लिये तैयार हैं. बाजार में कदम रखते ही लगता है कि मानों किसी रंगों की दुनिया में आ गये हों. बाजार में जाने वाले हर शख्स की नजर पिचकारी वाली दुकानों पर जा कर ठहर जाती है, जहां इस बार रंगों के त्यौहार को और भी रंगीन बनाने के लिए आकर्षक पिचकारियां एवं विभिन्न प्रकार के मुखौटे मौजूद है. एक जमाना था कि लोग पीतल और लोहे की बनी पिचकारियों से होली खेलते थे. लेकिन अब उन देशी पिचकारियों की जगह चाइनीज पिचकारियों ने ले ली है.
दुर्गापुर शहर के बेनाचिती के विक्रेता हरीश मोदी ने बताया कि इस बार नयी तरह की कई पिचकारियां आयी हैं. इसमें बच्चों के लिए छोटा भीम, वाटर गन, बेनटेन पाइप, मोटू-पतलू वाटर टैंक, स्पाइडर मैन वाटर टैंक, छोटा भीम वाटर टैंक, प्रेशर गन बाजार में उपलब्ध है. बैलून, लाल, पीली, नीली, सुनहरी और चंडी के चटक रंगों वाली रंगीन पिचकारियां बाजार में लोगों को आकर्षित कर रही है. इस बार होली सामग्री पर महंगाई की मार भी दिखाई पड़ रही है. बीते वर्ष की अपेक्षा रंग और गुलाल के दाम में दस प्रतिशत से ज्यादा का उछाल है. पिचकारी सहित अन्य सामान भी महंगे हैं. बाजार में दस रूपये से ढाई सौ रुपये तक की पिचकारियां और पचास रुपये से तीन सौ रुपये तक के मुखौटे उपलब्ध है.
रसायन युक्त रंगों का इस्तेमाल पर्व को कर सकता है बदरंग
भारतीय परंपरा से जुड़े होली पर्व को बदरंग करने के लिए बाजार में रसायन युक्त रंग बिक रहे हैं.ये केवल त्वचा ही नहीं बल्कि आंखों तथा गुर्दे के िलये भी हानिकारक है. जानकारों के अनुसार रसायन युक्त रंगों में ऑक्साइडाइज्ड धातु अथवा इंडस्ट्रियल डाई मिलायी जाती है. रंग को चमकदार बनाने के लिए पिसा हुआ कांच मिलाया जाता है. खासकर लाल रंग को आकर्षक बनाने के लिए मरकरी सल्फाइड का मिश्रण किया जाता है. यह रसायन अत्यधिक विषैला होता है. इससे संपर्क में आते ही त्वचा का कैंसर हो सकता है. इसी प्रकार एम्युनियम ब्रोमाइड से तैयार होने वाले सिल्वर रंग भी कैंसर का कारक बनता है. काला रंग लैंड ऑक्साइड से तैयार होता है. इससे गुर्दे खराब हो सकते हैं.
चर्म रोग विशेषज्ञों के अनुसार रसायन युक्त रंगों का बालों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है. कुछ समय बाद बाल रूखे होकर झड़ने लगते हैं. एिग्जमा या एटोपिक डर्मेटाइिटस से पीड़ित लोगों को संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है. रंग लगने वाले हिस्से पर तेज खुजली, लाल रंग के निशान, दाने-फुंसी व चले उभर सकते हैं. जिन लोगों की त्वचा अत्यधिक संवेदनशील होती है.
उन्हें मुंहासे हो जाते हैं. अहम बात यह है कि रसायन युक्त रंग शरीर के जिस हिस्से पर पड़ते हैं, वहां की त्वचा झुलस सकती है. ऐसे में इस प्रकार के रंगों की बजाय हर्बल रंगों का ही प्रयोग करना चाहिये. बाजार में लाल गुलाब, सूरजमुखी के फूलों से तैयार किया गया. पीला रंग होली में उल्लास भरने के लिए काफी है. नेत्र विशेषज्ञ के अनुसार ऐसे रंगों में कांच के महीन टुकड़े मिलाये जाते हैं, जो आंखों के लिए बेहद खतरनाक होते हैं. अगर यह रंग आंखों में चला जाये तो आंख में गंभीर घाव होने के साथ-साथ रोशनी तक जा सकती है.

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