भ्रष्टाचार. रानीगंज नगरपालिका के सुरुचि प्रोजेक्ट को लेकर उठा राजनीतिक विवाद
आगामी विधानसभा चुनाव के पहले ही तृणमूल शासित नगर निगम बोर्ड ने प्रोजेक्ट के मामले में तत्कालीन रानीगंज नगरपालिका अध्यक्ष रुणु दत्त व अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रस्ताव पारित कर राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया.
आसनसोल : रानीगंज के एनएसबी रोड के शिशु बगान स्थित ‘सुरुचि प्रोजेक्ट’ की जांच रिपोर्ट आसनसोल नगर निगम बोर्ड की बैठक में पेश किये जाने तथा इस मामले में कानूनी कार्रवाई किये जाने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित होने के बाद माकपा में हड़कंप मच गया है. इस रिपोर्ट में रानीगंज के पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष रुणु दत्त को पूरी गड़बड़ी के लिए सीधे दोषी ठहराया गया है. बोर्ड में मौजूद किसी भी माकपा पार्षद ने इसका विरोध नहीं तक नहीं किया. मीडिया में खबर आने के बाद माकपा के पांच पार्षदों ने मेयर को सूचित किया है कि उन्हें इस मामले की पूरी जानकारी नहीं थी. इस कारण कानूनी कार्रवाई अगली बैठक तक रोकी जाये.
क्या है पूरा मामला : मेयर श्री तिवारी ने बोर्ड की बैठक में ब्लू चिप्स प्रोजेक्ट्स प्रा. लि. के साथ तत्कालीन रानीगंज नगरपालिका के साथ हुए समझौते के संबंध में नगर निगम प्रशासन की ओर से गठित की गयी जांच रिपोर्ट पेश की. जांच कमेटी में निगम के सचिव प्रलय कुमार सरकार चेयरमैन थे. जबकि अन्य सदस्यों में निगम के कार्यपालक अभियंता सुकुमार मुखर्जी, राजस्व अधिकारी श्यामा प्रसाद मुखर्जी, विधि सलाहकार माधव बनर्जी तथा रानीगंज में पदास्थापित सहायक अभियंता अमित चटर्जी शामिल थे. इस कमेटी को उक्त आरोप की जांच करनी थी, जिसमें कहा गया था कि बिना किसी निविदा या एक्सप्रेषण ऑफ इंटरेस्ट (इओआइ) के निर्माण करने तथा राज्य सरकार के नियमों का उल्लंघन कर राशि का भुगतान किया गया. फिलहाल यह प्रोजेक्ट अधूरा पड़ा है तथा इस मामले में ब्लू चिप्स कंपनी ने कोलकाता हाइ कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है.
क्या क्या थे मौलिक तथ्य: कमेटी ने कहा है कि उन्होंने बीते नौ दिसंबर व 18 दिसंबर को रानीगंज कार्यालय का निरीक्षण किया.
उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन ्किया, संबंधित स्थल का निरीक्षण किया तथा उप सहायक अभियंता इंद्रजीत कोनार, स्टेनोग्राफर कम टाइपिस्ट देवाशीष श्याम तथा लेखा विभाग के कर्मी पार्थप्रतिम बनर्जी से पूछताछ की. जांच में तथ्य सामने आया कि म्यूनिसिपल मार्केट विकसित करने के लिए 19 जनवरी 1999 को राज्य सरकार ने 0.490 एक ड़जमीन का अधिग्रहण किया था. इस जमीन को नगरपालिका को हस्तांतरित कर दिया गया. बीते 30 मई को नगरपालिका बोर्ड की वार्षिक बैठक में निर्णय लिया गया कि ब्लूचिप्स प्रोजेक्ट्स प्रा. लि. के सहयोग से उक्त जमीन पर कमर्शियल कम्प्लेक्स सह शॉपिंग मॉल बनाया जायेगा. इसका नाम ‘द एक्सप्लेनेड’ रखा गया. जमीन की कीमत भूमि अधिग्रहण संग्राहक (बर्दवान) के स्तर से निर्धारित होगी तथा इसे प्रोजेक्ट्स इस मॉल के संचालन के लिए स्टीयरिंग कमेटी व बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का गठन किया जायेगा.
बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में रानीगंज के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष, ब्लू चिप्स कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर रितिक दास शामिल होंगे तथा लेखा मामले में पारदर्शिता के लिए दोनों पक्ष हर छह माह पर आय व खर्च की रिपोर्ट तैयार करेंगे. प्रोजेक्ट स्टीयरिंग कमेटी का गठन किये जाने के बाद भी यह कमेटी निष्क्रिय रही तथा 23 फरवरी, 2009 को हुए समझौते के तहत कमेटी को मिले अधिकार व कर्त्तव्य का निष्पादन करने में पूरी तरह विफल रही. भवन निरीक्षण में पाया गया कि सिर्फ स्ट्रक्चरल हिस्सा ही आंशिक रुप से पूरा हो पाया है. भीतर में प्लास्टरिंग का काम आंशिक रुप से किया गया है. बाहरी स्तर पर भी प्लास्टरिंग नहीं किया गया है.
नींद टूटी माकपा पार्षदों की
नगर निगम बोर्ड की बैठक में कानूनी कार्रवाई का समर्थन करनेवाले माकपा पार्षदों का परेशानी बढ़ गयी है. समर्थन करते समय उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं थी कि माकपा नेता रुणु दत्त इसके केंद्र में हैं.
माकपा के पांच पार्षदों ने मंगलवार को मेयर को पत्र लिख कर कानूनी कार्रवाई रोकने की अपील की है. इनमें विपक्ष के नेता व वार्ड 24 के पार्षद वसीमूल हक, वार्ड 35 के पार्षद मुइम खान, वार्ड 90 के पार्षद मागाराम बाउरी, वार्ड 89 के पार्षद आरिज जलीस तथा वार्ड नौ के पार्षद तापस कवि शामिल हैं. अंग्रेजी व बांग्ला में लिखे इन पत्रों के मजनून एक ही समान हैं. इसमें कहा गया है कि 29 फरवरी को हुयी बोर्ड की बैठक में रानीगंज मार्केट कम्प्लेक्स की जांच रिपोर्ट का मामला मौखिक रुप से मेयर ने उठाया था. स्थानीय स्तर पर जांच करने पर पता चला कि यह मामला विवादित है. बोर्ड बैठक में लिखित रुप से जांच रिपोर्ट पेश नहीं की गयी थी. इसलिए आग्रह किया जाता है कि इस मामले में लिया गया निर्णय स्थगित रखा जाये तथा इसे बोर्ड की अगली बैठक में पेश किया जाये.
कमेटी ने क्या क्या पाया जांच में
प्रोजेक्ट स्टीयरिंग कमेटी (पीएससी) व बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स पूरी तरह से निष्क्रिय व अपने दायित्वों के निर्वाहन में पूरी तरह से विफल रहे. अबतक हुए निर्माण का सुपरविजन या वेरीफिकेशन पीएससी ने नहीं किया है.
रानीगंज नगरपालिका के स्तर से भी इस कार्य का कोई निरीक्षण या समीक्षा नहीं की गयी. सात जुलाई, 2010 को हुयी बैठक के अनुसार कमेटी के समक्ष प्रोजेक्ट दस्तावेजों को जांच के लिए पेश किया गया. जांच के बाद इसे नगरपालिका के सक्षम अधिकारी की टिप्पणी के साथ लेखा विभाग में भेजा जाना चाहिए था. लेकिन इस नियम का पालन न कर इसके चार माह पहले ही 25 मार्च, 2010 को ब्लू चिप्स कंपनी को दस लाख 48 हजार 943 रुपये का भुगतान कर दिया गया. इसके लिए नगरपालिका चेयरमैन तथा नगरपालिका अधिकारियों को दोषी बताया गया है. इस भुगतान के लिए कोई बिल पेश नहीं किया गया है. जांच कमेटी ने कहा है कि नगरपालिका के तकनीशियन तथा लेखा विभाग के कर्मियों ने कमेटी को बताया कि एक्सप्लेनेड प्रोजेक्ट का निर्माण व ब्लू चिप्स कंपनी को भुगतान नगरपालिका अध्यक्ष के निर्देश पर किया गया तथा उनकी कोई बात नहीं सुनी गयी. उन्हें पूरे मामले में अंधेरे में रखा गया था.
आपराधिक मामला करार दिया कमेटी ने
कमेटी ने कहा है कि 10.48 लाख का भुगतान नियमों तथा समझौते के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है. नपा के तत्कालीन अध्यक्ष तथा कमेटी के कई अधिकारियों ने जनता की राशि का दुरुपयोग किया तथा यह आपराधिक मामला है.
उन्हें कथित मंजूर प्लान व साइट प्लान की फोटो प्रति उपलब्ध करायी गयी. उनकी बैधता पर ही संदेह है. देखने से लगता है कि उस पर नपा अध्यक्ष के हस्ताक्षर व मुहर हाल में लगाये गये हैं. इन दस्तावेजों को आधिकारिक स्तर पर नपा से जारी नहीं किया गया है. इन पर मेमो नंबर व तिथि दर्ज नहीं है. संबंधित सहायक अभियंता, उप सहायक अभियंता, ओवरसियर या तकनीशियन का हस्ताक्षर नहीं है. कार्यालय में उपस्थित दस्तावेजों के अवलोकन तथा कर्मियों से पूछताछ से स्पष्ट है कि बिल्डिंग प्लान व साइट प्लान की मंजूरी के लिए रानीगंज नगरपालिका या म्यूनिसिपल एक्सचेकर में कोई राशि जमा की गयी है. इस मामले में निविदा या आइओआइ आमंत्रित न करने का निर्णय लेकर अध्यक्ष व अधिकारियों ने नगरपालिका को आर्थिक क्षति पहुंचायी है.
यदि यह प्रक्रिया अपनायी गयी होती तो नगरपालिका को अधिकारियों द्वारा निर्धारित राशि से कई गुणा अधिक राशि प्राप्त होती. यदि बोर्ड में लिये गये निर्णय के अनुसार भूमि अधिग्रहण संग्राहक (बर्दवान) से जमीन की कीमत का मूल्यांकन कराया गया होता तो इसकी कीमत 90 लाख रुपये होती. लेकिन नगरपालिका अधिकारियों द्वारा जमीन की कीमत निर्धारण प्रक्रिया में संग्राहक या किसी विशेषज्ञ से कोई राय नहीं ली गयी.
