महारानी नारायणी कुमारी ने अष्ठ धातु से बनवायी थी भुवनेश्वरी प्रतिमा
काली प्रतिमा की अपनी विशिष्टता, न तो जीभ बाहर, न पैर के नीचे शिव
बर्दवान : बर्दवान शहर के मीठापुकुर मोहल्ले में ‘सोनार कालीबाडी’ (गोल्डेन कालीमाता के मंदिर) में विशाल शंख है. जिसकी आवाज के बीच रोजाना संध्या आरती और पूजा की जाची है. प्रति अमावश्या को भुवनेश्वरी काली की पूजा होती है.
मंदिर के सेवादार बर्दवान के छोटा राजकुमार डॉ प्रणय चंद महाताब है. मंदिर के पुजारी मानस मिश्र ने कहा कि आम दिनों में श्रद्धालुओं की संख्या कम रहती है लेकिन विशेष मौकों पर भीड़ बढ़ जाती है. वर्ष 1899 में तत्कालीन महारानी नारायणी कुमारी ने अष्ट धातु से भुवनेश्वरी प्रतिमा स्थापित की थी. मंदिर मै दक्षिणा काली, महालक्ष्मी, ग्रहराज और अंदर में पंचमुंडी का सिंहासन मौजूद है.
भुवनेश्वरी के घट में हर वक्त पानी भरा रहता है. लोककथा है कि बर्दवान के महाराजा महतब चांद की पत्नी महारानी नारायणी कुमारी धर्मपरायणा महिला थी. समुद्र के बीच में घूमने के समय उन्हें विशाल आकार का शंख मिला. हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि बर्दवान के महाराजा ने इस शंख को इटली से मंगवाया था. यह शंख एक हाथ लंबा है.
बर्दवान के ‘सोनार कालीबाडी’ में इस शंख के साथ ही मंदिर का ऐतिहासिक स्थापत्य और विभिन्न कहानी भी जुड़ी है. महारानी का तंत्र साधना में काफी रुचि थी. पूरे दिन पूजा करती रहती थी. उनके लिए ही राजा ने सोनार कालीबाड़ी का निर्माण किया. मंदिर में विद्यासागर भट्टाचार्या, मानस मिश्र और वामदेव भट्टाचार्य आदि रोजाना पूजा करते हैं.
मंदिर न्यास कमेटी इसका संचालन करती है. कालीपूजा अमावश्या के साथ ही बार्षिक कालीपूजा की रात में विशेष पूजा होती है. इस प्रतिमा की विशेषता यह है कि न तो काली की जीभ बाहर निकली रहती है और न पैरों के नीचे भगवान शिव होते हैं. रात में पूजा के बाद भोग वितरण होता है. घट स्थापना के बाद घट में पानी नहीं सूखा है. रोजाना शाम को शंख की आवाज से संध्या आरती की जाती है.
