दोहरी यातना झेल रहीं एसिड पीड़ित महिलाएं
कोलकाता: महिला आयोग द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कलकत्ता हाइकोर्ट के जस्टिस व एसएलएसए, पश्चिम बंगाल के कार्यकारी चैयरमेन जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने कहा कि एसिड पीड़ित महिलाओं को न्याय व मुआवजे के लिए दर-दर भटकना पड़ता है. उन्हें काफी यातना सहनी पड़ती है. ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि पीड़ित महिला की एफआइआर के साथ-साथ […]
कोलकाता: महिला आयोग द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कलकत्ता हाइकोर्ट के जस्टिस व एसएलएसए, पश्चिम बंगाल के कार्यकारी चैयरमेन जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने कहा कि एसिड पीड़ित महिलाओं को न्याय व मुआवजे के लिए दर-दर भटकना पड़ता है. उन्हें काफी यातना सहनी पड़ती है. ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि पीड़ित महिला की एफआइआर के साथ-साथ उसकी एक कॉपी एसपी व अस्पताल को तुरंत भेजी जाये.
इससे पीड़िता को भटकना नहीं पड़ेगा. उन्होंने पीड़ितों को समय पर मुआवजा दिलाने के लिए स्टेट लीगल सर्विस अॉथोरिटी (सालसा) के कर्मियों को मुस्तैदी से काम करने की सलाह दी. मानवता के आधार पर जस्टिस श्री बोस ने इस बात पर जोर दिया कि अगर पीड़ित महिला थाने तक नहीं जा सकती है, तो उसका कोई परिजन भी जाकर रिपोर्ट लिखवा सकता है. इसमें पुलिस को सहयोग करना चाहिए.
इस मामले में वास्तविक स्थिति यह है कि कई एसिड पीड़ितों को पूरा मुआवजा भी नहीं मिल पाता है. कुछ पीड़ितों ने बताया कि कई चक्कर काटने के बाद भी उनको मुआवजा नहीं मिल पाता है. मुर्शिदाबाद से आयी एक महिला ने कहा कि उसे अब तक केवल आधी राशि ही मिली है. दो साल से वह चक्कर काट रही है. कोई उसे नाैकरी भी नहीं देता है. उसे परिवार चलाने में काफी परेशानी होती है. गाैरतलब है कि हाल ही में सरकार ने एसिड पीड़ितों को अतिरिक्त एक लाख का मुआवजा देने का फैसला किया है. वीसीएस (विक्टिम कंपनसेशन स्कीम) 2013 में ऐसे पीड़ितों को तीन लाख रुपये का मुआवजा देना अनिवार्य है. प्रधानमंत्री नेशनल रिलीफ फंड के तहत केंद्र ने अब एक लाख रुपये आैर बढ़ा दिये हैं, लेकिन एसिड पीड़ित महिलाओं व उनके परिजनों का कहना है कि इसकी सर्जरी के पीछे लगभग 10-15 लाख रुपये का खर्च आ जाता है. यह राशि काफी कम है. जो लोग सर्जरी का खर्चा नहीं उठा पाते हैं, उनकी बेटियों या बहुओं को जीवन भर उसी बदरंग चेहरे के साथ जीना पड़ता है. हालांकि सर्जरी के बाद पूरी तरह ठीक होना संभव नहीं है, लेकिन फिर भी सुधार की गुंजाइश रहती है.
दमदम इलाके में रहनेवाली एसिड पीड़िता संचिता यादव का कहना है कि एसिड हमले के कारण उसके चेहरे का एक हिस्सा जल गया. एक आंख भी जल गयी. अभी उसने पत्थर की आंख लगवायी है. जब वह अस्पताल में भरती थी, तो उसके जख्मों से मवाद निकलता था. हमले के बाद उसे काफी पीड़ा झेलनी पड़ी. उसे रास्ते में मुंह ढक कर चलना पड़ता था. अपमान के डर से वह किसी से बात ही नहीं करती थी. उसे मुआवजा तो मिला, लेकिन काफी दिनों तक नाैकरी नहीं मिली. अभी एक नाैकरी मिली है, लेकिन उससे मेरा घर का खर्चा नहीं चल सकता है. इस क्षेत्र में काम कर रहे एक सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि कई पीड़ित ऐसी हैं, जो सर्जरी करवाने के लिए लाखों रुपये अपनी जेब से खर्च कर रही हैं. उनको मदद करने की जरूरत है. केवल मुआवजे की घोषणा करने से कुछ नहीं होता है. इन पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए सरकार को कोई ठोस कदम उठाना चाहिए. एक लाख रुपये की मदद ठीक है, लेकिन सरकार को उनकी जिंदगी सामान्य करने के लिए भी कुछ ठोस योजनाएं बनानी चाहिए. इनकी लंबे समय तक सर्जरी होती रहती है. इनकी साइकोलॉजिकल केयर, उनकी नाैकरी व उनके पुनर्वास के लिए भी सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए.
सरकारी मुआवजा पर्याप्त नहीं : ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क
ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के सहायक निदेशक सैवियो पिंटो का कहना है कि जिन महिलाओं पर एसिड फेंका जाता है, उनकी स्थिति बड़ी दयनीय होती है. उनको सामाजिक उपेक्षा के साथ-साथ काफी अपमान सहना पड़ता है. कोई उनको नाैकरी नहीं देना चाहता है. हमारी संस्था एसिड पीड़ितों के लिए निर्धारित मुआवजा व अन्य सुविधाओं के लिए कानूनी जानकारी प्रदान करती है. सरकार ने जो मुआवजा तय किया है, वह एसिड पीड़ितों के लिए पर्याप्त नहीं है. इन पीड़ितों को सर्जरी के लिए काफी खर्चा करना पड़ता है. कई बार दो-तीन या चार बार भी पीड़ितों को सर्जरी करवानी पड़ती है. ऐसे में यह मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरे के समान है.
पीड़ितों को शीघ्र मुआवजा देने की व्यवस्था हो : सुनंदा मुखर्जी
पश्चिम बंगाल महिला आयोग की अध्यक्ष सुनंदा मुखर्जी का कहना है कि समाज में अभी भी महिलाओं के प्रति लोगों का नजरिया नहीं बदला है. महिलाओं पर हाल में एसिड के हमले बढ़े हैं. आयोग में कई मामले दर्ज हुए हैं. आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं. कुछ को सजा हुई है, लेकिन फिर भी अपराधियों में इसको लेकर कोई भय नहीं है. एसिड पीड़ितों के लिए राज्य सरकार की ओर से तीन लाख व केंद्र सरकार की ओर से एक लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की गयी है. कई पीड़ित महिलाओं को अभी भी मुआवजा की राशि नहीं मिली है. वे यातना का जीवन गुजार रही हैं. कुछ महिलाएं एनजीओ के भरोसे अलग से किराये के मकान में रह रही हैं, क्योंकि गांव में अपने घर जाने में उनको हमेशा डर सताता रहता है. एसिड हमलावरों को कड़ी सजा देने के साथ ही पीड़ित महिलाओं को शीघ्र मुआवजा देने व कोर्ट में मामले के शीघ्र निपटारे की व्यवस्था होनी चाहिए.
महिलाओं पर एसिड हमले शर्मनाक : डॉ शशि पांजा
राज्य की महिला व बाल विकास मंत्री डॉ शशि पांजा का कहना है कि महिलाओं पर बढ़ रहे एसिड के हमले शर्मनाक हैं. इससे पीड़ित महिला का जीवन ही दुश्वार हो जाता है. एसिड जो बेच रहा है या जो खरीद रहा है, उस पर भी नजर रखी जानी चाहिए. एसिड हमले का खामियाजा महिलाओं को जीवन भर भुगतना पड़ता है. फिर भी इस स्थिति में महिलाएं आज सरवाइव कर रही हैं, यह एक बहुत बड़ी बात है. राज्य सरकार की ओर से एसिड पीड़ित महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए हाथ का काम सिखाने की व्यवस्था की जा रही है. ऐसी पीड़ित महिलाओं के उपचार के लिए इलाज व मुआवजे की व्यवस्था है, लेकिन महिलाओं को इसकी जानकारी नहीं है. हाल ही में पश्चिम बंगाल सरकार ने क्लिनिक स्टेबिलिस्ड एक्ट बनाया है. इस एक्ट के बाद एसिड पीड़ित महिलाओं के इलाज के लिए निजी अस्पताल भी ना नहीं कर पायेंगे.