कागजों में 'मृत' महिला पहुंची हाईकोर्ट, बोली 'मैं जिंदा हूं साहब, राशन कार्ड बनवा दीजिए'

UP News: प्रयागराज की चंदा देवी को प्रशासनिक चूक के कारण कागजों में मृत घोषित कर दिया गया, जिससे वह सरकारी योजनाओं से वंचित हो गईं. मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है.

प्रयागराज की चंदा देवी के लिए सरकारी फाइलों का एक गलत इंद्राज जी का जंजाल बन गया है. पति साधुराम के निधन के बाद अकेले जीवन यापन कर रही इस असहाय महिला को प्रशासनिक अधिकारियों ने कागजों में मृत घोषित कर दिया. इसके कारण न तो उनका राशन कार्ड बन पा रहा है और न ही उन्हें किसी अन्य सरकारी कल्याणकारी योजना का लाभ मिल पा रहा है. लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद भी जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो मजबूरन उन्हें न्याय के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी.

न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की पीठ ने लिया कड़ा संज्ञान

मामले की गंभीरता को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने इस पर गहरा आश्चर्य और नाराजगी व्यक्त की है. अदालत ने इस पूरे वाकये को नागरिक के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों पर सीधा प्रहार करार दिया है. कोर्ट ने कहा कि किसी जीवित व्यक्ति को अभिलेखों में मृत दर्ज करना केवल एक मामूली प्रशासनिक चूक नहीं है. इस तरह की लापरवाही आम आदमी के जीवन से जुड़ी मूलभूत सुविधाओं को छीन लेती है, जो कि बेहद चिंताजनक विषय है.

हाईकोर्ट ने डीएम, डीएसओ और ग्राम प्रधान को स्पष्टीकरण के साथ किया तलब

हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए प्रयागराज के जिलाधिकारी (डीएम), जिला पूर्ति अधिकारी (डीएसओ) और हंडिया तहसील के वारी गांव के ग्राम प्रधान को व्यक्तिगत रूप से अदालत में तलब किया है. अधिकारियों को स्पष्ट करना होगा कि आखिर किन परिस्थितियों में महिला को मृत घोषित किया गया और अब तक इस गलती को क्यों नहीं सुधारा गया. इसके साथ ही, कोर्ट ने अधिकारियों को यह भी सत्यापित करने का निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता चंदा देवी वास्तव में साधुराम की ही विधवा हैं.

आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए अदालती हस्तक्षेप बना अंतिम उम्मीद

यह मामला एक बार फिर यह साबित करता है कि नौकरशाही की जरा सी लापरवाही किसी आम नागरिक के दैनिक जीवन को कितना दुष्कर बना सकती है. जब जिला स्तर पर अधिकारियों का रवैया ढुलमुल रहता है, तब अदालत का हस्तक्षेप ही शोषित और असहाय लोगों के लिए एकमात्र सहारा बनता है. हाईकोर्ट की इस सख्त कार्रवाई से उम्मीद जगी है कि चंदा देवी को न केवल उनका कानूनी हक और सम्मान वापस मिलेगा, बल्कि अन्य जिम्मेदार अधिकारियों को भी भविष्य के लिए अपनी जवाबदेही का सबक मिलेगा.

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By शशांक शेखर मिश्रा

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