UP News: उत्तर प्रदेश का अमरोहा अपनी धार्मिक आस्था, गंगा-जमुनी तहजीब, पारंपरिक कारीगरी और खास पैदावार के लिए देश-दुनिया में अलग पहचान रखता है. यहां द्वापरकालीन वासुदेव तीर्थ से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हैं, तो हजरत शाह विलायत की ऐतिहासिक दरगाह सूफी परंपरा की मिसाल पेश करती है. वहीं, अमरोहा की ढोलक ने यहां के हुनर को देश-विदेश तक पहुंचाया है. दुर्लभ आमों की किस्मों और तिगरी मेले जैसी परंपराओं ने इस जिले की पहचान को और खास बनाया है.
वासुदेव तीर्थ से जुड़ी है भगवान कृष्ण की मान्यता
अमरोहा की आध्यात्मिक पहचान में प्राचीन श्री वासुदेव तीर्थ का खास स्थान है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण इस पवित्र स्थल पर आए थे और यहां स्थित कुंड में स्नान कर पिंडदान किया था. करीब 5300 वर्ष पुराने इस तीर्थ को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है. मान्यता है कि यहां के पवित्र सरोवर में मत्स्य और कच्छप अवतारों के प्रतीक मौजूद हैं. तीर्थ परिसर में विशाल वट वृक्ष के नीचे स्वयं प्रकट शिवलिंग को बाबा बटेश्वरनाथ के नाम से पूजा जाता है. सालभर देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं.
शाह विलायत की दरगाह और बिच्छुओं से जुड़ी अनोखी मान्यता
अमरोहा की पहचान धार्मिक विविधता तक भी सीमित नहीं है. यहां हजरत शाह विलायत की ऐतिहासिक दरगाह सूफी परंपरा और साझा संस्कृति का प्रमुख केंद्र मानी जाती है. वर्ष 1272 ईस्वी में सूफी संत हजरत शाह विलायत के अमरोहा आगमन के बाद यह स्थान आस्था का बड़ा केंद्र बन गया. दरगाह परिसर में पाए जाने वाले बिच्छुओं को लेकर एक अनोखी मान्यता प्रचलित है. मान्यता है कि ये बिच्छू लोगों को डंक नहीं मारते. दूर-दराज से आने वाले जायरीन और पर्यटक इन्हें हाथ पर रखकर तस्वीरें भी खिंचवाते हैं. यही परंपरा इस दरगाह को अमरोहा के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है.
ढोलक की थाप ने अमरोहा के हुनर को पहुंचाया विदेशों तक
अमरोहा की पहचान में ढोलक उद्योग की भी अहम भूमिका है. यहां तैयार होने वाली ढोलक की मांग देश के साथ विदेशों में भी है. उत्तर प्रदेश सरकार की एक जिला एक उत्पाद (ODOP) योजना के तहत अमरोहा की ढोलक को विशेष पहचान मिली है. यहां के कारीगर लकड़ी के एक ही टुकड़े को तराशकर ढोलक, पंजाबी ढोल, पखावाज और तबले का ढांचा तैयार करते हैं. पीढ़ियों से चली आ रही यह कारीगरी आज पारंपरिक हुनर और आधुनिक सुविधाओं के मेल से आगे बढ़ रही है. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं.
आम, तिगरी मेला और पुरानी विरासत भी खास पहचान
अमरोहा की पहचान धार्मिक और संगीत विरासत के अलावा अपनी खास पैदावार और ऐतिहासिक स्थलों से भी जुड़ी है. यहां मिलने वाला ‘नियादर मनोता’ आम अपनी विशेषता के लिए जाना जाता है. इससे तैयार होने वाला अचार लंबे समय तक सुरक्षित रहने के लिए प्रसिद्ध है. जिले का ऐतिहासिक बाह का कुआं भी इसकी पुरानी विरासत की कहानी कहता है. वहीं, गंगा किनारे स्थित तिगरी घाट पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला तिगरी मेला लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. इस तरह आस्था, सूफी परंपरा, संगीत, कारीगरी और लोक संस्कृति को अपने भीतर समेटे अमरोहा आज भी अपनी सदियों पुरानी विरासत के साथ अलग पहचान बनाए हुए है.
Input: अंजली
