उत्तर प्रदेश सरकार सोनभद्र के सोनांचल क्षेत्र की प्रमुख नदियों—सोन, रिहंद, कनहर, कर्मनाशा और बेलन के घाटों पर गंगा आरती की तर्ज पर नियमित आरती शुरू करने जा रही है. राज्य स्वच्छ गंगा मिशन के निर्देश पर जिला गंगा समिति ने इसके लिए एक-एक स्थानीय पुजारी को तैनात करने की योजना बनाई है. इन पुजारियों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा ताकि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ नदी संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सके.
पर्यावरण संकट और प्रशासनिक अनदेखी पर उठते सवाल
आरती कराने की इस सरकारी पहल पर अब स्थानीय स्तर पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं. आलोचकों का कहना है कि नदियों की वास्तविक समस्या अवैध खनन और औद्योगिक प्रदूषण है, जिन पर प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा है. सोन नदी में अवैध खनन के कारण गहरे गड्ढों में डूबकर दो बच्चों की मौत हो चुकी है. उद्योगों के विषैले कचरे से नदियां लगातार प्रदूषित हो रही हैं, लेकिन प्रशासन की चुप्पी से अवैध गतिविधियां बिना रोक-टोक जारी हैं.
जारी पत्र में खामियां और पारंपरिक मान्यताएं
प्रशासन द्वारा जारी पत्र में कई तकनीकी और सांस्कृतिक खामियां भी सामने आई हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सोन को 'नद' (पुरुष) माना गया है, जिसकी पारंपरिक पूजा या आरती का विधान नहीं है. इसके अतिरिक्त, पत्र में छठ पूजा पुजारियों से कराने की बात कही गई है, जबकि यह एक लोक आस्था का पर्व है जिसमें पुजारियों की कोई भूमिका नहीं होती. बजट और अवैध खनन पर रोक की अस्पष्टता भी इस योजना पर सवाल खड़े करती है.
जन जागरुकता और व्यावहारिक धरातल की चुनौतियां
यद्यपि सरकार का मुख्य उद्देश्य धार्मिक आयोजनों के माध्यम से स्थानीय समुदाय को नदी संरक्षण और स्वच्छता अभियान से जोड़ना है, फिर भी इसकी सफलता पर संशय बना हुआ है. केवल आरती का आयोजन करने और पुजारियों को नियुक्त करने मात्र से भू-माफियाओं के अवैध खनन तथा कारखानों के प्रदूषण पर अंकुश लगाना संभव नहीं दिखता. जब तक कड़े प्रशासनिक कदम नहीं उठाए जाते, तब तक नदियों की स्थिति में वास्तविक सुधार होना बेहद मुश्किल माना जा रहा है.
