UP ELECTION 2027: यूपी चुनाव से पहले SIR के बाद SAR पर मचा घमासान, अखिलेश यादव को क्यों सता रहा डर...

UP ELECTION 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच वोटर लिस्ट को लेकर राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने SIR के बाद SAR प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए वोटर लिस्ट में बड़े बदलाव की आशंका जताई है.

UP ELECTION 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ वोटर लिस्ट को लेकर सियासत तेज हो गई है. SIR के बाद अब SAR को लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सवाल खड़े किए हैं. उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए वोटर लिस्ट में बड़े बदलाव की तैयारी हो सकती है. आखिर SAR क्या है और अखिलेश यादव को इससे किस बात का डर है?

SIR के बाद SAR पर क्यों उठे सवाल?

उत्तर प्रदेश में SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया के दौरान करीब 2.04 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने का दावा किया गया है. अब SAR यानी स्पेशल एनुअल रिवीजन को लेकर सपा अध्यक्ष ने चिंता जताई है. अखिलेश यादव का आरोप है कि SIR के बाद भी वोटर लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया जारी रखना सवाल खड़े करता है.

अखिलेश यादव ने क्या लगाया आरोप?

अखिलेश यादव का दावा है कि SAR के जरिए पड़ोसी राज्यों से लोगों के नाम यूपी की वोटर लिस्ट में जोड़े जा सकते हैं. उन्होंने बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से लोगों को लाकर अलग-अलग बूथों पर वोट बनवाने की आशंका जताई है. उनका कहना है कि चुनाव से पहले इस तरह की कवायद चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है. इसी वजह से सपा ने अपने बूथ लेवल एजेंट और डिजिटल टीमों को सतर्क रहने को कहा है.

SIR और SAR में क्या है अंतर?

SIR (Special Intensive Revision) एक विशेष और गहन मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया है. इसमें बूथ स्तर पर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया जाता है. इसका उद्देश्य मृत, स्थान बदल चुके या अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना और पात्र लोगों को सूची में शामिल करना है. इसके विपरीत SAR ( Special Annual Revision) नियमित वार्षिक पुनरीक्षण की प्रक्रिया है. इसमें नए मतदाताओं के नाम जोड़ने और वोटर लिस्ट में जरूरी बदलाव किए जाते हैं.

नियमों में क्या है प्रावधान?

SIR के बाद SAR होना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है. मतदाता सूची को अपडेट रखने के लिए नियमित पुनरीक्षण की व्यवस्था है. अब 18 साल की उम्र पूरी करने वाले युवाओं को साल में चार तय तारीखों पर मतदाता बनने का मौका मिलता है. ये तारीखें 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर हैं. इसके अलावा मृत्यु या पता बदलने जैसी वजहों से नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया भी चलती रहती है.

क्या SAR बना चुनावी मुद्दा?

अखिलेश यादव की चिंता सिर्फ वोटर लिस्ट तक सीमित नहीं है. इसके पीछे 2027 के चुनाव की तैयारी भी दिखाई दे रही है. यूपी जैसे बड़े राज्य में छोटी संख्या में वोटों का अंतर भी कई सीटों पर नतीजा बदल सकता है. ऐसे में सपा वोटर लिस्ट की हर एंट्री पर नजर रखना चाहती है. अब सवाल यही है कि SAR एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया साबित होगा या 2027 के चुनाव से पहले यह बड़ा सियासी मुद्दा बन जाएगा.

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By अंजली कश्यप

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