खंडहरों में छिपा है 1000 साल पुराना राज. गोमती किनारे की यह इमारत क्यों कहलाती है 'प्राचीन बंदरगाह?

UP News: उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में गोमती नदी के किनारे एक प्राचीन बंदरगाह के रहस्यमयी अवशेष मिले हैं. यह खंडहर अपने भीतर हज़ारों साल पुरानी व्यापार और सभ्यता की कहानी समेटे हुए है.

UP News: कहते हैं, जहां धुआं होता है...वहां आग भी जरूर होती है. इतिहास भी कुछ ऐसा ही होता है. कई बार पुरानी इमारतें... टूटी दीवारें और खामोश खंडहर ऐसी कहानियां अपने भीतर छिपाए रखते हैं...जिन पर पहली नजर में यकीन करना आसान नहीं होता. उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर भी ऐसी ही एक जगह है, जहां समुद्र तो कभी नहीं था... लेकिन लोगों का मानना है कि गोमती नदी के किनारे कभी एक छोटा बंदरगाह हुआ करता था. यह दावा भले ही पूरी तरह साबित न हुआ हो, लेकिन यहां मौजूद पुराने अवशेष आज भी लोगों की जिज्ञासा बढ़ा देते हैं.

गोमती किनारे बसा था सुल्तानपुर का पुराना शहर 

आज का सुल्तानपुर जिस जगह बसा है...उससे अलग पुराने समय में बस्ती गोमती नदी के उत्तर की ओर हुआ करती थी. उस दौर में यहां भर शासकों का राज था और उनका एक किला भी मौजूद था. अब यह किला खंडहर में बदल चुका है, लेकिन उसके आसपास आज भी इतिहास की कई निशानियां देखने को मिलती हैं. इन्हीं में से एक गोमती नदी के किनारे बनी पुरानी इमारत है, जो लाखौरी ईंटों से तैयार की गई थी.

गोमती नदी से चलता था व्यापार, नावों से पहुंचता था सामान 

स्थानीय लोगों का मानना है कि यह जगह कभी नदी के रास्ते आने वाले सामान को उतारने और दूसरी जगह भेजने का केंद्र रही होगी. उस समय सड़कें और बड़े वाहन नहीं होते थे, इसलिए नदी ही सफर और व्यापार का सबसे आसान रास्ता मानी जाती थी. नावों से अनाज, लकड़ी, कपड़ा और दूसरी जरूरी चीजें यहां तक लाई जाती थीं. इसके बाद यही सामान पास में बने किले तक पहुंचाया जाता था. अगर किसी दूसरे इलाके में सामान भेजना होता था, तो नावों के जरिए यहीं से रवाना किया जाता था.

क्या यह था सुल्तानपुर का प्राचीन नदी बंदरगाह? 

पुराने किले और इस इमारत के बीच की दूरी भी बहुत ज्यादा नहीं है. दोनों जगहों के बीच करीब 300 मीटर का ही फासला है. यही वजह है कि कई लोग मानते हैं कि यह इमारत किले से जुड़ी किसी व्यवस्था का हिस्सा रही होगी. हालांकि इसे बंदरगाह साबित करने वाला कोई पक्का ऐतिहासिक दस्तावेज आज तक सामने नहीं आया है. फिर भी नदी के किनारे इसकी मौजूदगी और इसमें इस्तेमाल हुई लाखौरी ईंटें इस बात की ओर इशारा जरूर करती हैं कि यह कोई साधारण निर्माण नहीं था.

भर शासकों से लेकर दिल्ली सल्तनत तक, ऐसे बदली सुल्तानपुर की पहचान 

इतिहासकारों के अनुसार, मध्यकाल में इस इलाके पर भर शासकों का प्रभाव था. बाद में पश्चिम दिशा से आए राजपूतों ने धीरे-धीरे यहां अपनी पकड़ मजबूत कर ली. समय के साथ कई लड़ाइयां हुईं और सत्ता बदलती चली गई. बाद में दिल्ली सल्तनत के दौर में भी इस इलाके में बड़े बदलाव हुए. इन्हीं घटनाओं के बाद इस क्षेत्र की पहचान और नाम दोनों बदल गए और धीरे-धीरे यह इलाका सुल्तानपुर के नाम से जाना जाने लगा.

खंडहर आज भी बयां करते हैं गोमती के सुनहरे अतीत की कहानी 

आज भले ही यह इमारत टूट चुकी हो और उसके कई हिस्से समय की मार झेल चुके हों, लेकिन इसके बचे हुए अवशेष अब भी लोगों को पुराने दौर की याद दिलाते हैं. यह जगह इस बात का एहसास कराती है कि कभी गोमती नदी सिर्फ पानी की धारा नहीं थी... बल्कि लोगों की जिंदगी, व्यापार और आने-जाने का सबसे बड़ा सहारा भी थी. यही वजह है कि सुल्तानपुर का यह अनोखा इतिहास आज भी लोगों के लिए किसी रहस्य से कम नहीं माना जाता.

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Published by: Lucky Kumari

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