UP ATS Naxal Encounter: वाराणसी में रविवार सुबह यूपी एटीएस की मुठभेड़ में झारखंड के नक्सली बृजेश गंझू के मारे जाने के बाद सोनभद्र जिले में नक्सलवाद का दौर चर्चा में आ गया. कभी जिले के जंगलों में नक्सलियों की सक्रियता पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए चुनौती थी. नगवां, मांची, चोपन और कोन के सीमावर्ती इलाकों से लेकर बिहार-झारखंड सीमा तक संगठन की गतिविधियां दर्ज होती थीं. चुनाव बहिष्कार, हत्या, हमले और अवैध वसूली जैसी घटनाओं ने लंबे समय तक लोगों में डर बनाया.
चुनाव बहिष्कार से लेकर सुरक्षा अभियान तक
सोनभद्र के जंगलों में वर्ष 2000 के आसपास नक्सली गतिविधियों में तेजी देखी गई थी. जिले की सीमाएं मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ से जुड़ी होने के कारण जंगल क्षेत्र संवेदनशील माना जाता था. वर्ष 2002 में बिहार सीमा से लगे नगवां क्षेत्र के गांवों में नक्सलियों ने विधानसभा चुनाव के बहिष्कार का फरमान जारी किया था. ग्रामीणों को बैठक में बुलाकर मतदान को लेकर निर्देश दिए जाने की बात सामने आई थी. इसके बाद सुरक्षा बलों ने अभियान तेज किया और संगठन का प्रभाव धीरे सिमटा.
मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल की गिरफ्तारी बनी अहम कड़ी
नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई में मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल की गिरफ्तारी को मोड़ माना गया. दोनों को कनछ-कन्हौरा जंगल में हुई मुठभेड़ के बाद पकड़ा गया था. पुलिस के अनुसार मुन्ना राज्यों में सक्रिय रहा था और उस पर दस लाख रुपये का इनाम घोषित था. अजीत कोल पर पचास हजार रुपये का इनाम बताया गया था. इन गिरफ्तारियों के बाद सुरक्षा अभियानों से नक्सली नेटवर्क पर दबाव बढ़ा तथा क्षेत्र में संगठन की गतिविधियां कमजोर होती चली गईं.
सीआरपीएफ की तैनाती से बढ़ी जंगलों में निगरानी
वर्ष 2003 में नक्सली गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए सोनभद्र और चंदौली के क्षेत्रों में सीआरपीएफ की तैनाती की गई थी. सिलहट, मांची, महुली, पोखरिया और कनछ जैसे इलाकों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाई गई. इसी दौर में विजयगढ़ के युवराज शरदचंद पद्म शरण शाह की हत्या ने क्षेत्र में चिंता बढ़ा दी थी. इसके बाद पुलिस और केंद्रीय बलों ने जंगलों में कांबिंग तथा निगरानी तेज की. कार्रवाई का असर यह हुआ कि नक्सलियों की गतिविधियां सीमित होने लगीं.
हिनौता लैंडमाइन विस्फोट ने बढ़ाई थी दहशत
20 नवंबर 2004 को चंदौली के हिनौता में नक्सलियों ने लैंडमाइन विस्फोट कर पीएसी के वाहन को निशाना बनाया था. इसमें 16 पुलिसकर्मियों की मौत हुई और हथियार लूटे जाने की जानकारी सामने आई थी. घटना नक्सली हिंसा की घटनाओं में शामिल भी रही. इसके बाद वर्षों तक छिटपुट घटनाएं सामने आती रहीं. नौ अक्टूबर 2009 को मांची थाना क्षेत्र के रामपुर गांव में शिवप्रकाश उर्फ डब्लू कुशवाहा की हत्या का मामला सामने आया, जिसे नक्सली गतिविधियों से जोड़ा गया.
2012 की कार्रवाई में पकड़े गए थे मुन्ना और अजीत
11 अक्टूबर 2011 को चोपन थाना क्षेत्र में पियरिया माटी से कन्हौरा जाने वाले रास्ते पर कनछ पहाड़ी पर पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी. इसके बाद 24 मई 2012 को कनछ-कन्हौरा जंगल में पुलिस, एसओजी और सीआरपीएफ की संयुक्त टीम ने कार्रवाई की. पुलिस के अनुसार करीब दो घंटे चली मुठभेड़ के बाद मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल गिरफ्तार किए गए. मुन्ना के पास से एसएलआर और 55 कारतूस बरामद होने का दावा किया गया. यह कार्रवाई नक्सल नेटवर्क के खिलाफ महत्वपूर्ण रही.
2012 के बाद बड़ी नक्सली घटना नहीं हुई
मुन्ना और अजीत की गिरफ्तारी के बाद लालव्रत कोल को पुलिस ने गिरफ्तार किया. पूछताछ में संगठन के कमजोर पड़ने की जानकारी सामने आने की बात कही गई. वर्ष 2012 के बाद सोनभद्र में कोई बड़ी नक्सली घटना सामने नहीं आई. हालांकि सीमावर्ती जंगलों में संदिग्ध गतिविधियों को देखते हुए बलों की कांबिंग, नियमित निगरानी जारी रही. अदालत ने वर्ष 2024 में प्रतिबंधित असलहा रखने के मामले में मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल को उम्रकैद सुनाई तथा जुर्माना लगाया.
2025 में भी मिली उम्रकैद, फिर बृजेश गंझू की मौत से चर्चा
वर्ष 2025 में 15 वर्ष पुराने रामवृक्ष हत्याकांड में मुन्ना विश्वकर्मा और अजीत कोल को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. इस तरह गिरफ्तारी, मुकदमों और सुरक्षा अभियानों के बाद सोनभद्र में नक्सली गतिविधियों पर विराम बना हुआ है. अब वाराणसी में बृजेश गंझू की मुठभेड़ में मौत के बाद पूर्वांचल में नक्सल नेटवर्क और उसके पुराने ठिकानों की चर्चा तेज हुई है. वर्तमान स्थिति को समझने के लिए सुरक्षा एजेंसियों की आधिकारिक जानकारी और कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जाएगी.
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