विकास दुबे एनकाउंटर केस : क्या न्यायाधीश के रिश्तेदार का राजनीतिक दल में होना गैरकानूनी है : कोर्ट

नयी दिल्ली : विकास दुबे मुठभेड़ कांड और आठ पुलिसकर्मियों के नरसंहार की घटना की जांच के लिये गठित आयोग का पुनर्गठन किये जाने की मांग पर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाते हुये याचिकाकर्ता वकील से सवाल किया कि अगर किसी न्यायाधीश का रिश्तेदार राजनीतिक दल में है तो क्या इसे गैरकानूनी कृत माना जायेगा. प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रणमियन की पीठ ने कहा कि अनेक न्यायाधीश हैं जिनके रिश्तेदार सांसद हैं.

नयी दिल्ली : विकास दुबे मुठभेड़ कांड और आठ पुलिसकर्मियों के नरसंहार की घटना की जांच के लिये गठित आयोग का पुनर्गठन किये जाने की मांग पर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाते हुये याचिकाकर्ता वकील से सवाल किया कि अगर किसी न्यायाधीश का रिश्तेदार राजनीतिक दल में है तो क्या इसे गैरकानूनी कृत माना जायेगा. प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे, न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रणमियन की पीठ ने कहा कि अनेक न्यायाधीश हैं जिनके रिश्तेदार सांसद हैं.

पीठ ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय को फटकार लगाते हुये कहा कि न्यायिक आयोग की अध्यक्षता करने वाले उसके किसी भी पूर्व न्यायाधीश पर मीडिया की खबरों के आधार पर आक्षेप नहीं लगाया जा सकता है. पीठ शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश डॉ. बलबीर सिंह चौहान, उच्च न्यायाय के पूर्व न्यायाधीश शशि कांत अग्रवाल और प्रदेश के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता की सदस्यता वाले जांच आयोग के पुनर्गठन के लिये दायर अर्जी की सुनवाई कर रही थी.

उपाध्याय ने पीठ से कहा कि न्यायमूर्ति डॉ. चौहान के भाई उत्तर प्रदेश में विधायक हैं, जबकि उनकी पुत्री का विवाह एक सांसद से हुआ है. पीठ ने इस अर्जी पर सुनवाई पूरी करते हुये उपाध्याय से सवाल किया कि क्या न्यायमूर्ति चौहान का कोई रिश्तेदार इस घटना या जांच से जुड़ा हुआ है और वह (न्यायमूर्ति चौहान) निष्पक्ष क्यों नही हो सकते हैं.

पीठ ने कहा,‘‘ऐसे न्यायाधीश हैं जिनके पिता या भाई या रिश्तेदार सांसद हैं. क्या आप यह कहना चाहते हैं कि ये सभी न्यायाधीश दुराग्रह रखते हैं? यदि कोई रिश्तेदार किसी राजनीतिक दल में है तो क्या यह गैरकानूनी कृत्य है?” इस पर उपाध्याय ने तमाम प्रकाशनों में प्रकाशित लेख पढ़ते हुये कहा कि इनमें जांच आयोग द्वारा की जा रही जांच पर सवाल उठाये गये हैं.

पीठ ने कहा, ‘‘आप समाचार पत्रों की खबरों से संबंधित कानून जानते हैं. आप समाचारपत्रों की खबरों के आधार पर इस न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश पर आक्षेप नहीं लगा सकते हैं.” पीठ ने कहा कि न्यायमूर्ति चौहान उच्चतम न्यायालय के सम्मानित न्यायाधीश रह चुके हैं. वह उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं.

पीठ ने कहा, ‘‘उनके रिश्तेदारों से कभी समस्या नहीं हुयी तो आज आपको समस्या क्यों है?” उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सालिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जांच आयोग में न्यायमूर्ति चौहान की नियुक्त पर लगाये गये आरोप ‘अपमानजनक’ हैं. उन्होंने कहा, ‘‘वह (उपाध्याय) आरोप लगा रहे हैं कि इस न्यायालय द्वारा चयनित आयोग सारे मामले पर पर्दा डालेगा यह अपमानजनक हैं.”

उपाध्याय ने कहा कि उत्तर प्रदेश मुठभेड़ों वाला राज्य बनता जा रहा है और यह पूरी विधि व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है. उन्होंने कहा, ‘‘अभी कुछ दिन पहले ही राजीव पाण्डे नाम के व्यक्ति की मुठभेड़ हुयी है. इस पर पीठ ने कहा, ‘‘आप इस न्यायालय के एक सम्मानित पूर्व न्यायाधीश पर तरह तरह के आरोप लगा रहे हैं. वह इस न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं.”

पीठ ने उपाध्याय से कहा कि अब वह अप्रासंगिक बातें कर रहे हैं. प्रत्येक राज्य में हजारों अपराध होते हैं, लेकिन उनका इस आयोग से क्या संबंध है. उपाध्याय ने 30 जुलाई को पुलिस मुठभेड़ में गैंगस्टर विकास दुबे के मारे जाने और इससे पहले कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों के नरसंहार की घटनाओं की जांच के लिये गठित जांच आयोग के अध्यक्ष शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश डॉ. बलबीर सिंह चौहान और दोनों अन्य सदस्यों के स्थान पर आयोग का पुनर्गठन करने के लिये एक नयी अर्जी दायर की थी.

इससे पहले, 28 जुलाई को भी जांच आयोग के दो सदस्यों को बदलने के लिये दायर आवेदन खारिज करते हुये न्यायालय ने कहा था कि वह आयोग पर किसी तरह के आक्षेप लगाने की इजाजत याचिकाकर्ता को नहीं देगी. उपाध्याय ने अपने नये आवेदन में विकास दुबे द्वारा किये गये अपराधों तथा उसकी पुलिस और नेताओं के साथ कथित साठगांठ के आरोपों की जांच के लिये उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल के पुनर्गठन का भी अनुरोध किया था.

शीर्ष अदालत ने 22 जुलाई को अपने आदेश में कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या और इसके बाद मुठभेड़ में विकास दुबे और उसके पांच सहयोगियों के मारे जाने की घटनाओं की जांच के लिये शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश डॉ. बलबीर सिंह चौहान की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग के गठन के मसौदे को मंजूरी दी थी. न्यायालय ने कहा था कि जांच आयोग एक सप्ताह के भीतर अपना काम शुरू करके इसे दो महीने में पूरा करेगा.

जांच आयोग को कानपुर के चौबेपुर थाने के अंतर्गत बिकरू गांव में तीन जुलाई को आधी रात के बाद विकास दुबे को गिरफ्तार करने गयी पुलिस की टुकड़ी पर घात लगाकर किये गये हमले में पुलिस उपाधीक्षक देवेन्द्र मिश्रा सहित आठ पुलिसकर्मियों के शहीद होने की घटना की जांच करनी है. इसके अलावा आयोग को 10 जुलाई को विकास दुबे की मुठभेड़ में मौत की घटना और इससे पहले अलग अलग मुठभेड़ में दुबे के पांच साथियों के मारे जाने की घटना की जांच करनी है.

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