कानपुर में थाईलैंड-कंबोडिया वाली HBE बीमारी की दस्तक से मचा हड़कंप! गर्भवतियों में मिले मामले, बीटा थैलेसीमिया के साथ बार-बार चढ़ सकता है खून, जानें लक्षण

UP News: कानपुर में दक्षिण-पूर्व एशिया में पाए जाने वाले HBE हीमोग्लोबिन वैरिएंट के मामले सामने आए हैं. यह गंभीर एनीमिया का कारण बन सकता है, खासकर गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में. जानें इसके लक्षण और जांच के तरीके.

UP News: दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों में पाए जाने वाले हीमोग्लोबिन ई यानी HBE वैरिएंट के मामले अब कानपुर में भी सामने आए हैं. जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग की स्टडी में इसकी पहचान हुई है. जांच किए गए 83 मरीजों में 10.8 प्रतिशत में HBE वैरिएंट पाया गया. इनमें करीब 70 प्रतिशत महिलाएं ऐसी थीं, जिनकी जांच गर्भावस्था के दौरान की गई थी.

बीटा थैलेसीमिया के साथ गंभीर हो सकती है स्थिति

शोध में सामने आया कि HBE वैरिएंट वाले मरीजों में अगर बीटा थैलेसीमिया भी मौजूद हो, तो खून की कमी की समस्या गंभीर हो सकती है. ऐसी स्थिति में लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से टूटती हैं और हीमोग्लोबिन कम होने लगता है. गंभीर मामलों में मरीज को नियमित रूप से रक्त चढ़ाने की जरूरत भी पड़ सकती है. अध्ययन में कुछ मरीजों का हीमोग्लोबिन स्तर 5.55 ग्राम प्रति डेसीलीटर तक दर्ज किया गया.

सामान्य एनीमिया समझना पड़ सकता है भारी

विशेषज्ञों ने HBE से जुड़े मामलों में जांच को महत्वपूर्ण बताया है. कई मरीजों में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते और हल्का एनीमिया हो सकता है. ऐसे में इसे केवल आयरन की कमी मान लेना समस्या पैदा कर सकता है. जरूरत से ज्यादा आयरन शरीर में जमा होने पर लीवर और तिल्ली पर असर पड़ने का खतरा रहता है. अध्ययन में HBE मरीजों का औसत हीमोग्लोबिन 9.44 ग्राम प्रति डेसीलीटर पाया गया.

गर्भावस्था के दौरान स्क्रीनिंग पर जोर

अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों ने विवाह-पूर्व और गर्भावस्था की शुरुआत में हीमोग्लोबिन से जुड़े आनुवांशिक विकारों की जांच पर जोर दिया है. डॉ. लुबना खान के मुताबिक, यदि किसी महिला में HBE ट्रेट पाया जाता है तो उसके जीवनसाथी की स्क्रीनिंग भी महत्वपूर्ण है. इससे बच्चे में आनुवांशिक हीमोग्लोबिन विकार का जोखिम समझने में मदद मिल सकती है.

HPLC जांच से मिलेगी बीमारी की पहचान

विशेषज्ञों के अनुसार, एनीमिया या रक्त जांच में असामान्य परिणाम आने पर केवल पोषण संबंधी कमी को कारण मानना पर्याप्त नहीं है. हीमोग्लोबिनोपैथी की पहचान के लिए उचित हीमोग्लोबिन विश्लेषण जरूरी है. HPLC यानी हाई-परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी का इस्तेमाल विभिन्न हीमोग्लोबिन वैरिएंट की पहचान के लिए किया जाता है. जरूरत पड़ने पर बीमारी की पुष्टि के लिए अतिरिक्त जांच भी कराई जा सकती है.

क्या है HBE, कब बढ़ता है जोखिम?

HBE एक आनुवांशिक हीमोग्लोबिन वैरिएंट है, जो बीटा-ग्लोबिन जीन में बदलाव से जुड़ा होता है. ज्यादातर मामलों में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं या दिखाई नहीं देते. हालांकि, जब HBE बीटा थैलेसीमिया के साथ मौजूद होता है, तब एनीमिया गंभीर रूप ले सकता है और कुछ मरीजों को बार-बार रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है. विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि सीमित संख्या में मरीजों पर हुए इस अध्ययन के आधार पर पूरे कानपुर या उत्तर भारत में HBE की प्रसार दर तय नहीं की जा सकती. यह भी देखें: बागपत में नहीं चली कोई पहचान! IAS के पिता का 30 साल पुराना स्कूटर और ADO की 15 साल पुरानी बाइक सीज, जाने क्यों

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By नटवर कुमार

नटवर कुमार पत्रकारिता के क्षेत्र में दो वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले पत्रकार हैं.वे ग्राउंड रिपोर्टिंग और जनहित से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से कवर करते हैं. राजनीतिक घटनाक्रम, स्थानीय समस्याओं, प्रशासनिक गतिविधियों, अपराध, सामाजिक मुद्दों और आम लोगों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि है. उनका प्रयास खबरों को तथ्यात्मक, स्पष्ट और पाठकों के लिए उपयोगी तरीके से प्रस्तुत करना रहता है.नटवर कुमार ने इतिहास में मास्टर ऑफ आर्ट्स (M.A. History) और मास्टर इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की पढ़ाई पटना से की है. इतिहास और पत्रकारिता में उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें घटनाओं को व्यापक संदर्भ में समझने और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करने में मदद करती है.इस दौरान उन्होंने दूरदर्शन पटना में भी समय दिया है. नटवर कुमार मूल रूप से बिहार के दिनकर की भूमि बेगूसराय जिले के रहने वाले हैं.

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