UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट के इतिहास में न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त का नाम हिंदी के प्रति उनके असाधारण समर्पण के लिए याद किया जाता है. उन्होंने अंग्रेजी के दबदबे वाली न्यायिक व्यवस्था में हिंदी को अपनी कार्यभाषा बनाया और अपने सभी फैसले हिंदी में लिखे. उनके लिए हिंदी में न्यायिक काम करना केवल भाषा का चुनाव नहीं, बल्कि एक संकल्प था. इसी प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जाने का अवसर भी स्वीकार नहीं किया, क्योंकि वहां फैसलों के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल होता था.
सुप्रीम कोर्ट का प्रस्ताव भी नहीं बदला फैसला
सीनियर एडवोकेट प्रदीप कुमार के मुताबिक, न्यायमूर्ति गुप्त की निर्णय क्षमता से सुप्रीम कोर्ट काफी प्रभावित था. उन्हें कई बार संकेत दिया गया कि अगर वह कुछ आदेश अंग्रेजी में लिखने के लिए तैयार हो जाएं तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जा सकता है. हालांकि उन्होंने अपने सिद्धांत से समझौता नहीं किया. एक अवसर पर उन्हें मद्रास हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की बात भी सामने आई. उन्होंने कहा कि तमिल में फैसले लिखने के लिए सहयोगी जज की मदद ली जा सकती है, लेकिन अंग्रेजी में आदेश लिखना उन्हें मंजूर नहीं था.
हिंदी में बहस रोकने पर निकाला अनोखा रास्ता
करीब 1972-73 में चर्चित शमीम रहमानी हत्याकांड की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गुप्त के सामने एक अलग परिस्थिति बनी. उस समय वह सरकारी वकील के तौर पर मामले में पैरवी कर रहे थे और उन्हें हिंदी में बहस करने से रोक दिया गया. इसके बाद उन्होंने लीगल डिक्शनरी से लैटिन के कानूनी शब्द खोजे और अदालत में लैटिन भाषा में बहस शुरू कर दी. चूंकि लैटिन कानूनी भाषा मानी जाती थी, इसलिए उन्हें रोका नहीं जा सका. आखिरकार जजों के लिए स्थिति कठिन हुई और उन्हें हिंदी में बहस करने की अनुमति मिल गई.
कारोबार से कानून तक का सफर आसान नहीं था
प्रदीप कुमार के अनुसार उनका परिवार मूल रूप से इटावा का रहने वाला है. पिता के बचपन में ही परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं. बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके ताऊ ने उन्हें कारोबार संभालने को कहा, क्योंकि उनकी तबीयत खराब रहती थी. इसके बावजूद उन्होंने चोरी-छिपे एलएलबी की पढ़ाई पूरी की और कानून की दुनिया में आगे बढ़े. वर्ष 1977 से 1992 के बीच उन्होंने 40 हजार से ज्यादा फैसले हिंदी में दिए, जो हिंदी न्यायिक लेखन की दिशा में उनकी बड़ी पहचान बनी.
आपातकाल में हिंदी के आदेश की भी बनी मिसाल
आपातकाल के दौर में मीसा बंदियों की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल की गई थीं. इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस एनबी अस्थाना की अध्यक्षता वाली पूर्ण पीठ ने की थी. बताया जाता है कि उस दौरान चीफ जस्टिस एनबी अस्थाना ने अपना आदेश हिंदी में दिया था. न्यायिक व्यवस्था में हिंदी के इस्तेमाल की यह परंपरा आगे चलकर भाषा और न्याय के संबंध पर होने वाली बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी.
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