UP का वो धाम, जहां शिव के तीसरे नेत्र से भस्म हुए थे कामदेव: आज भी जिंदा है जला हुआ आम का पेड़

UP News: बलिया का कामेश्वर धाम सिर्फ एक पौराणिक स्थल नहीं, बल्कि अनेक कथाओं का संगम है. यहां शिव के तीसरे नेत्र से भस्म हुए कामदेव की गाथा और आज भी जीवित एक जला हुआ आम का पेड़ मौजूद है. जानें इस प्राचीन धाम का पूरा इतिहास.

UP News: यूपी के बलिया की पहचान सिर्फ बागी तेवर और क्रांतिकारियों की धरती तक सीमित नहीं है. इस मिट्टी की परतें जितनी कुरेदिए, उतनी ही पुरानी कथाएं सामने आती हैं. इन्हीं कथाओं के बीच चितबड़ागांव क्षेत्र का कारो स्थित कामेश्वर धाम अपनी अलग पहचान रखता है. मान्यता है कि इसी धरती पर भगवान शिव ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म किया था. यही वजह है कि इसे कामदहन भूमि भी कहा जाता है. बलिया जिला प्रशासन की वेबसाइट पर भी कामेश्वर धाम कारो को जिले के प्रमुख पौराणिक स्थलों में शामिल किया गया है और इसे रामायण काल से जुड़े स्थलों की परंपरा से जोड़ा गया है.

सती के वियोग में समाधिस्थ थे शिव, देवताओं के सामने था बड़ा संकट

पौराणिक कथा के अनुसार माता सती के देहत्याग के बाद भगवान शिव संसार से विरक्त होकर गहरी समाधि में चले गये थे. इसी बीच तारकासुर का आतंक बढ़ता गया. देवताओं को ज्ञात था कि उसका अंत शिव-पुत्र के हाथों ही संभव है. लेकिन जब महादेव समाधि में हों तो यह संभव कैसे हो? देवताओं ने कामदेव को शिव की समाधि भंग करने का जिम्मा सौंपा. कामदेव ने पुष्पबाण चलाया. शिव की समाधि टूटी और उनका क्रोध प्रचंड हो उठा. तीसरा नेत्र खुला और उसकी अग्नि में कामदेव भस्म हो गये.


जला हुआ आम का पेड़

आम का वह पेड़, जिसे आज भी कथा का गवाह मानते हैं लोग

कारो धाम की सबसे रोचक बात यहां मौजूद प्राचीन आम का पेड़ है. मान्यता है कि कामदेव इसी पेड़ की ओट में छिपकर भगवान शिव पर पुष्पबाण चला रहे थे. स्थानीय परंपरा में इस पेड़ को उसी घटना से जोड़कर देखा जाता है. प्रकाशित विवरणों में इसे जला हुआ और फिर भी जीवित रहने वाला पेड़ बताया गया है. आज भी श्रद्धालुओं के लिए यह पेड़ कारो की कथा का सबसे बड़ा प्रतीक है. हालांकि, इसकी पौराणिक उम्र या कामदहन की घटना का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. इसे धार्मिक मान्यता और स्थानीय जनश्रुति के रूप में ही देखा जाना चाहिए.


वरिष्ठ साहित्यकार शिवकुमार कौशिकेय द‍्वारा लिखी गई पुस्तक में वर्णित

राम-लक्ष्मण के कदम पड़ने की भी मान्यता

कारो की कहानी सिर्फ शिव और कामदेव तक नहीं रुकती. स्थानीय मान्यता के अनुसार त्रेता युग में महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम और लक्ष्मण भी इस क्षेत्र से होकर गुजरे थे. कहा जाता है कि बक्सर की ओर जाते समय उन्होंने इस क्षेत्र में रात्रि विश्राम किया था. बलिया जिला प्रशासन भी कामेश्वर धाम कारो को रामायण काल से जुड़े स्थलों में गिनता है. इस तरह कारो की स्मृति में एक तरफ शिव-कामदेव की कथा है, तो दूसरी तरफ राम-लक्ष्मण और विश्वामित्र की यात्रा की परंपरा.

दुर्वासा की तपोभूमि और बाबा कीनाराम से भी जुड़ती है कड़ी

कारो धाम की धार्मिक महत्ता को यहां की संत परंपरा और मजबूत करती है. स्थानीय परंपराओं में महर्षि दुर्वासा की तपस्या से भी इस क्षेत्र को जोड़ा जाता है. वहीं अघोर परंपरा के महान संत बाबा कीनाराम के जीवन से भी कारो का संबंध बताया जाता है. प्रकाशित विवरणों के अनुसार आध्यात्मिक यात्रा के शुरुआती दौर में बाबा कीनाराम यहां पहुंचे थे और संत शिवराम से उनका संपर्क हुआ था. यानी कारो सिर्फ पौराणिक कथा का स्थल नहीं, बल्कि साधना और संत परंपरा से जुड़ी भूमि भी है.


कारोधाम

एक धाम, तीन शिवालय और तीन अलग-अलग लोककथाएं

कारो धाम की खासियत यहां मौजूद प्राचीन शिवालयों की परंपरा भी है. उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में कामेश्वरनाथ, कवलेश्वरनाथ और बालेश्वरनाथ मंदिरों का उल्लेख मिलता है. कामेश्वरनाथ को कामदहन की मुख्य कथा से जोड़ा जाता है. वहीं कवलेश्वरनाथ को लेकर मान्यता है कि अयोध्या के राजा कवलेश्वर ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी. इसी से जुड़े विशाल जलाशय को रानी पोखरा कहा जाता है. बालेश्वरनाथ मंदिर से भी कई लोककथाएं जुड़ी हैं. इनमें 18वीं सदी में हमले के दौरान शिवलिंग से भौंरों के निकलने की कथा विशेष रूप से प्रचलित है. इसे भी ऐतिहासिक प्रमाण के बजाय स्थानीय जनश्रुति के रूप में देखना उचित है.

रानी पोखरा आज भी समेटे है धाम की पुरानी तस्वीर

मंदिर परिसर से जुड़ा रानी पोखरा कारो की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है. कभी यह ग्रामीण जीवन और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा. समय के साथ इसके आसपास विकास कार्य हुए और इसे पक्का कराया गया. आज भी मंदिर, पोखरा, प्राचीन वृक्ष और आसपास का वातावरण मिलकर कारो को सामान्य शिव मंदिर से अलग पहचान देते हैं.

सावन में हर-हर महादेव से गूंज उठता है कारो

सावन आते ही कारो धाम की रौनक बढ़ जाती है. दूर-दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. कई श्रद्धालु गंगा से जल लेकर पैदल कामेश्वर धाम तक पहुंचने की परंपरा निभाते रहे हैं. सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की खबरें वर्षों से प्रकाशित होती रही हैं. 2023 और 2024 में भी जलाभिषेक और श्रद्धालुओं की भीड़ को लेकर खबरें सामने आयीं, जबकि 2026 की महाशिवरात्रि पर भी धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने की रिपोर्ट सामने आई.

अब पौराणिक धरोहर को पर्यटन के नक्शे पर लाने की तैयारी

कारो की कहानी अब मंदिर की चारदीवारी से निकलकर पर्यटन की संभावनाओं तक पहुंच रही है. जिला स्तर पर कामेश्वर धाम को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजनाओं पर चर्चा हुई है. प्रस्तावों में टूरिस्ट शेल्टर, शौचालय, पार्किंग, पाथवे, धर्मशाला, मल्टीपरपज हॉल, रानी तालाब का विकास और योग सेंटर जैसी सुविधाओं का उल्लेख किया गया है. धाम तक पहुंच आसान बनाने के लिए सड़क चौड़ीकरण की योजनाएं भी सामने आती रही हैं. 2021 में नरहीं से कामेश्वर धाम कारो तक सड़क चौड़ीकरण के लिए करीब 12 करोड़ रुपये की योजना की जानकारी दी गयी थी.

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By Tilak Kumar

तिलक कुमार पिछले 14 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है. अमर उजाला, प्रभात खबर, जनसंदेश टाइम्स और राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में क्राइम रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं. अपराध, राजनीति और हाइपरलोकल पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता के क्षेत्र हैं. मैदानी रिपोर्टिंग के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली खबरों को पाठकों तक पहुंचाया है. जमीनी मुद्दों की गहरी समझ और तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग उनकी पहचान रही है. वर्तमान में वह प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ जुड़े हुए हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध तथा जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार लेखन और रिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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