दूसरी शादी पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला, पहली पत्नी जीवित हो तो दूसरी को नहीं मिलेगा 'पति' का दर्जा

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मुस्लिम समुदाय को छोड़कर अन्य किसी भी धर्म में पहली पत्नी के जीवित रहते किया गया दूसरा विवाह शुरू से ही शून्य माना जाएगा. यह फैसला जमानत आदेश के दौरान सुनाया गया, जिसमें 'पति' की कानूनी परिभाषा पर विस्तार से चर्चा की गई.

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि मुस्लिम समुदाय को छोड़कर अन्य किसी भी धर्म में पहली पत्नी के जीवित रहते और पहला विवाह वैध रहने की स्थिति में किया गया दूसरा विवाह शुरू से ही शून्य माना जाएगा. ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 (दहेज मृत्यु) और धारा 85 (क्रूरता) के तहत पति की कानूनी परिभाषा में नहीं आएगा. हाई कोर्ट ने कहा- मुस्लिमों को छोड़ अन्य धर्मों में दूसरी शादी अमान्य, दहेज हत्या और क्रूरता की धाराओं के तहत पति नहीं बनेगा. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पीलीभीत के एक मामले में जमानत देते हुए यह टिप्पणी की.

जमानत आदेश के दौरान हाई कोर्ट ने 'पति' की कानूनी परिभाषा स्पष्ट की

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने पीलीभीत निवासी सर्वेश उर्फ छोटू उर्फ छोटेलाल की जमानत याचिका मंजूर करते हुए की. आरोपी के खिलाफ मधौटांडा थाने में बीएनएस की धारा 80(2), 85 और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 व 4 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था. आरोप था कि मृत महिला आरोपी की दूसरी पत्नी थी और उसकी शादी के सात वर्ष के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी.

सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों का हवाला देकर स्पष्ट की कानूनी स्थिति

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2004 के रीमा अग्रवाल बनाम अनुपम मामले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि दहेज कानूनों का उद्देश्य महिलाओं को संरक्षण देना है, इसलिए "पति" शब्द की व्यापक व्याख्या की जानी चाहिए. हालांकि अदालत ने कहा कि बाद में वर्ष 2007 में शिवचरण लाल वर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि विवाह शुरू से ही शून्य है, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (अब बीएनएस की धारा 85) के तहत अभियोजन नहीं चलाया जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट की 2023 की नजीर का हवाला, अपवाद की स्थिति भी बताई

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्ष 2023 में पी. शिवकुमार बनाम राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा था कि दंडात्मक कानूनों की व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए और यदि किसी प्रावधान की दो संभावित व्याख्याएं हों तो आरोपी के पक्ष में जाने वाली व्याख्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि पहली शादी की वैधता ही विवादित या संदिग्ध हो, तो दूसरी शादी में साथ रह रहा व्यक्ति "पति" माना जा सकता है. वहीं हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम, विदेशी विवाह अधिनियम, ईसाई विवाह अधिनियम और पारसी विवाह एवं तलाक अधिनियम के तहत पहली शादी कायम रहते दूसरी शादी शून्य मानी जाएगी.

चार्जशीट दाखिल और आपराधिक इतिहास न होने पर कोर्ट ने दी राहत

मामले के तथ्यों पर अदालत ने कहा कि वादी पक्ष ने स्वयं स्वीकार किया था कि मृत महिला आरोपी की दूसरी पत्नी थी और पहली पत्नी उस समय जीवित थी. रिकॉर्ड के अनुसार महिला ने जहर खाकर आत्महत्या की थी. आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था, चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी और वह 28 जनवरी 2026 से जेल में बंद था. इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने का आदेश दिया. - इनपुट: शशांक मिश्रा यह भी पढ़ें: उत्तर प्रदश की खबरें पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें


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लेखक के बारे में

By राधेश्याम कुशवाहा

राधेश्याम कुशवाहा को पत्रकारिता की क्षेत्र में 13 साल का अनुभव है. इस सफर की शुरुआत उन्होंने राज एक्सप्रेस न्यूज पेपर भोपाल से की. यहां से आगे बढ़ते हुए समय जगत, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान न्यूज पेपर के बाद वर्तमान में प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में यूपी डेस्क का नेतृत्व कर रहे हैं. इन्हें धर्म-अध्यात्म, ज्योतिष, राजनीति, अपराध और सकारात्मक खबरों की रिपोर्टिंग व लेखन में विशेष रुचि रखते हैं.

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