UP News: समय बदलता है... राजे-रजवाड़े खत्म हो जाते हैं... लेकिन उनकी बनाई इमारतें सदियों तक इतिहास की गवाही देती रहती हैं. मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के मंडलेश्वर में नर्मदा नदी के किनारे बना करीब 300 साल पुराना बाजीराव पेशवा का किला भी ऐसी ही एक ऐतिहासिक धरोहर है. कभी यह मराठा शासन की ताकत और पेशवाओं की शान का प्रतीक था... लेकिन समय के साथ इसकी पहचान बदलती चली गई. पहले अंग्रेजों ने इस पर कब्जा किया... फिर इसे जेल बना दिया गया. बाद में होलकर शासन में भी इसका इस्तेमाल जेल के रूप में होता रहा. आजादी के बाद भी इसकी भूमिका नहीं बदली और आज भी यह सब जेल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. हालांकि अब यह ऐतिहासिक किला संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे जर्जर होता जा रहा है.
300 साल पहले पेशवाओं ने बनवाया किला, फिर अंग्रेजों ने कर लिया कब्जा
इतिहासकारों के मुताबिक इस किले का निर्माण करीब 300 साल पहले बाजीराव पेशवा प्रथम ने कराया था. किला बनने के बाद इसे मंडलेश्वर के काशी विश्वनाथ मंदिर की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभाने वाले महाराष्ट्र से आए जहागीरदार परिवार को रहने के लिए सौंप दिया गया. यह परिवार लंबे समय तक यहां रहा और किले की देखरेख भी करता रहा. लेकिन अंग्रेजी शासन आने के बाद इस किले की किस्मत बदल गई. इतिहासकार दुर्गेश राजदीप बताते हैं कि जिस तरह झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को दत्तक पुत्र लेने के विवाद के बाद सत्ता से हटाया गया था, उसी तरह जहागीरदार परिवार की जागीर भी दत्तक उत्तराधिकारी के कारण खत्म कर दी गई. इसके बाद अंग्रेजों ने पूरे किले पर कब्जा कर लिया और इसका इस्तेमाल अपने प्रशासनिक कामों के लिए शुरू कर दिया.
पहले बना सरकारी खजाना, फिर अंग्रेजों ने इसी किले को बना दिया जेल
अंग्रेजों ने सबसे पहले इस किले को सरकारी खजाना रखने की जगह बनाया. उस समय मंडलेश्वर निमाड़ क्षेत्र में अंग्रेजों की एक बड़ी सैन्य छावनी हुआ करता था. यहां बड़ी संख्या में सैनिक, घुड़सवार और अंग्रेज अधिकारी तैनात रहते थे. बाद में वर्ष 1890 में इस किले को आधिकारिक तौर पर जेल घोषित कर दिया गया. हालांकि वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी अंग्रेज इस किले का इस्तेमाल जेल के रूप में कर रहे थे.
यहीं कैद थीं भीमा नायक की मां, अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ भड़का था विद्रोह
निमाड़ क्षेत्र के कई स्वतंत्रता सेनानियों को इसी जेल में कैद रखा गया था. प्रसिद्ध क्रांतिकारी भीमा नायक की माता सुरसी बाई को भी इसी किले की जेल में बंद किया गया था. बताया जाता है कि अंग्रेजों द्वारा दी गई यातनाओं के दौरान उनकी मौत हो गई थी. इस घटना से नाराज क्रांतिकारियों ने किले पर हमला कर अंग्रेजों को वहां से खदेड़ दिया था.
होलकर शासन से आजादी तक... जेल के रूप में बदलता रहा किले का इतिहास
बाद में वर्ष 1864 में यह किला फिर से होलकर शासन के अधीन आ गया. लेकिन होलकरों ने भी इसका इस्तेमाल जेल के रूप में ही जारी रखा. देश को आजादी मिलने के बाद यह सेंट्रल जेल से जिला जेल बना. बाद में जिला मुख्यालय खरगोन स्थानांतरित होने के बाद इसे सब जेल में बदल दिया गया. आज भी यह ऐतिहासिक किला जेल के रूप में उपयोग में है.
300 साल पुरानी धरोहर पर संकट, संरक्षण मिला तो इतिहास को मिलेगी नई पहचान
करीब तीन सदियों का इतिहास अपने भीतर समेटे यह किला आज भी पेशवा शासन, अंग्रेजी हुकूमत, स्वतंत्रता संग्राम और होलकर काल की कई अनसुनी कहानियां सुनाता है. लेकिन रखरखाव और संरक्षण की कमी के कारण इसकी कई दीवारें कमजोर हो चुकी हैं और ढांचा भी धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होता जा रहा है. स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों का कहना है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को पुरातत्व विभाग के संरक्षण में लिया जाना चाहिए. अगर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए तो न केवल निमाड़ के गौरवशाली इतिहास को बचाया जा सकेगा...बल्कि यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या भी बढ़ेगी और इस अनमोल विरासत को नई पहचान मिल सकेगी.
