कोल्हान विश्वविद्यालय की करोड़ों की डिजिटल लैंग्वेज लैब 8 साल से बंद, धूल फांक रहे कंप्यूटर और स्मार्ट बोर्ड

Kolhan University: कोल्हान विश्वविद्यालय और उसके अंगीभूत कॉलेजों में करोड़ों रुपये की डिजिटल लैंग्वेज लैब आठ वर्षों से बंद पड़ी है. तकनीकी विशेषज्ञों की नियुक्ति और संचालन व्यवस्था नहीं होने से कंप्यूटर, स्मार्ट बोर्ड व अन्य उपकरण बेकार पड़े हैं, जिससे विद्यार्थियों को डिजिटल शिक्षा का लाभ नहीं मिल रहा.

Kolhan University: डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने और विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के उद्देश्य से कोल्हान विश्वविद्यालय और उसके अंगीभूत कॉलेजों में करोड़ों रुपये की लागत से स्थापित की गई डिजिटल लैंग्वेज लैब पिछले आठ वर्षों से बंद पड़ी है. वर्ष 2017 में बड़े सपनों के साथ तैयार की गई यह आधुनिक व्यवस्था आज प्रशासनिक उदासीनता की शिकार होकर केवल कमरों की शोभा बढ़ा रही है. लैब में लगे कंप्यूटर, स्मार्ट बोर्ड, प्रोजेक्टर, एयर कंडीशनर, वेब कैमरा और अन्य डिजिटल उपकरण उपयोग के अभाव में धूल फांक रहे हैं. शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक आधारित बदलाव लाने के उद्देश्य से स्थापित इस परियोजना का लाभ आज तक विद्यार्थियों को नहीं मिल सका. विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही के कारण करोड़ों रुपये का निवेश निष्प्रभावी होकर रह गया है.

चार संस्थानों में तैयार की गई थी डिजिटल लैब

डिजिटल लैंग्वेज लैब की स्थापना कोल्हान विश्वविद्यालय के पीजी भवन के अलावा टाटा कॉलेज, महिला कॉलेज और जेएलएन कॉलेज में की गई थी. इन सभी संस्थानों में आधुनिक उपकरणों से लैस लैब तैयार की गई थी ताकि विद्यार्थी भाषा शिक्षण और डिजिटल लर्निंग का लाभ उठा सकें. विश्वविद्यालय मुख्यालय के पीजी ब्लॉक में 26 कंप्यूटर लगाए गए थे. इसके अलावा टाटा कॉलेज में 15, महिला कॉलेज में 12 और जेएलएन कॉलेज में 8 कंप्यूटर स्थापित किए गए. इन लैब में प्रोजेक्टर, स्मार्ट बोर्ड, हाई-स्पीड नेटवर्क, वेब कैमरा और अन्य आवश्यक संसाधन भी उपलब्ध कराए गए थे.

संचालन की जिम्मेदारी तय नहीं हुई

परियोजना पूरी होने के बाद सबसे बड़ी कमी इसके संचालन को लेकर सामने आई. विश्वविद्यालय प्रशासन ने न तो किसी अधिकारी को लैब संचालन की जिम्मेदारी सौंपी और न ही तकनीकी विशेषज्ञों की नियुक्ति की. परिणामस्वरूप लैब का नियमित संचालन कभी शुरू ही नहीं हो सका. समय बीतने के साथ उपकरण निष्क्रिय होते चले गए. वर्षों से बंद पड़े कंप्यूटर और अन्य डिजिटल संसाधन अब रखरखाव के अभाव में खराब होने की स्थिति में पहुंच रहे हैं.

कम्यूनिकेशन स्किल विकसित करने का था उद्देश्य

इस आधुनिक लैंग्वेज लैब का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों के कम्यूनिकेशन स्किल को मजबूत करना था. इसके माध्यम से अंग्रेजी, बांग्ला और विभिन्न क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं के विद्यार्थियों को अन्य भाषाएं सीखने का अवसर मिलना था. साथ ही भाषा अनुसंधान, उच्चारण सुधार, डिजिटल कंटेंट निर्माण और मल्टीमीडिया आधारित शिक्षण को भी बढ़ावा देने की योजना थी. यदि यह लैब नियमित रूप से संचालित होती, तो विद्यार्थियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की भाषा प्रशिक्षण सुविधाएं अपने ही परिसर में उपलब्ध हो सकती थीं.

ऑनलाइन शिक्षा को भी मिलना था बढ़ावा

डिजिटल लैंग्वेज लैब के माध्यम से शिक्षकों को अपने व्याख्यान रिकॉर्ड कर ऑनलाइन उपलब्ध कराने की सुविधा भी दी गई थी. इससे विद्यार्थी अपनी सुविधा के अनुसार कभी भी लेक्चर सुन सकते थे और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों को भी इसका बड़ा लाभ मिलता. नई शिक्षा नीति के तहत डिजिटल शिक्षण और ई-लर्निंग को विशेष महत्व दिया जा रहा है, लेकिन कोल्हान विश्वविद्यालय में वर्षों पहले बनाई गई यह व्यवस्था आज तक विद्यार्थियों के उपयोग में नहीं आ सकी.

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करोड़ों की सरकारी संपत्ति हो रही बेकार

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस लैब को चालू कर दिया जाए, तो हजारों विद्यार्थियों को आधुनिक भाषा प्रशिक्षण और डिजिटल शिक्षा का लाभ मिल सकता है. वर्तमान में करोड़ों रुपये की लागत से खरीदे गए उपकरण उपयोग के अभाव में निष्प्रयोज्य होते जा रहे हैं, जिससे सरकारी धन की बर्बादी भी हो रही है. विद्यार्थियों और शिक्षकों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन को तत्काल तकनीकी कर्मियों की नियुक्ति कर लैब को चालू करना चाहिए. इससे न केवल डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि विद्यार्थियों की भाषा दक्षता, रोजगार क्षमता और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी बेहतर हो सकेगी. आठ वर्षों से बंद पड़ी यह परियोजना अब इस बात का उदाहरण बन गई है कि बेहतर योजनाएं भी प्रभावी क्रियान्वयन के अभाव में कैसे निष्प्रभावी हो जाती हैं.

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लेखक के बारे में

Published by: Kumarvishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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