रांची से प्रणव की रिपोर्ट
झारखंड के सारंडा का जंगल आज भी नक्सलियों की शरणस्थली बना हुआ है. साल 2004 से नक्सलियों को खत्म करने के लिए अभियान जारी है. जनवरी 2025 से इस अभियान की गति तेज की गई. इधर 31 मार्च 2026, की समय सीमा खत्म होने पर भी यहां पर नक्सलियों की चुनौती कायम है. यहां 21 वर्ग किमी के दायरे में फैले दुर्गम मंकी फॉरेस्ट में इस समय 53 नक्सलियों को सुरक्षाबलों ने घेर रखा है. नक्सलियों के साथ पुलिस की भिड़ंत जारी है. ऐसे में प्रभात खबर की टीम ने 14 से 17 अप्रैल तक 820 वर्ग किमी में फैले इस अति दुर्गम नक्सल प्रभावित क्षेत्र सारंडा का जायजा लिया.
पहाड़ियों से घिरा है सारंडा
झारखंड का सारंडा 700 पहाड़ियों से घिरा है. इनसे होकर नक्सली आसानी से ओडिशा की ओर निकल जाते हैं. मंकी फॉरेस्ट में कच्चे रास्तों से होकर सुरक्षाबलों को गुजरना होता है. इन कच्चे रास्तों पर 400 से ज्यादा प्रेशर आइइडी बम नक्सलियों ने प्लांट कर रखे हैं. जंगल इतना घना है कि ड्रोन से सिर्फ ऊपरी भाग दिखता है. नीचे कौन है, यह नहीं दिखता. ये स्थितियां नक्सलियों को यहां सुरक्षित बनाते हैं. सारंडा क्षेत्र में पहाड़ियों के नीचे सालों भर पानी का नाला बहता रहता है. यह नक्सलियों के लिए वरदान साबित हो रहा. इस क्षेत्र में माइंस भरपूर हैं, जिनसे नक्सलियों को मोटी लेवी मिलती है. ये वो तमाम वजहें हैं, जिनकी वजह से इस इलाके में अब तक सुरक्षाबल नक्सलियों को खत्म करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं.
क्या है मंकी फॉरेस्ट
सारंडा के वलिवा और समटा के बीच बाबूडेरा-चारूडीह क्षेत्र है. इस क्षेत्र को सुरक्षाबलों ने मंकी फॉरेस्ट नाम दिया है. अब यहीं 53 नक्सलियों ने पनाह ले रखी है. वन विभाग की नजर में ये एरिया शैडो क्षेत्र है, जहां विभागीय स्तर पर कोई काम नहीं होता है. साल 1980 में यहां फॉरेस्ट गार्ड का एक क्वार्टर बनाया गया था. उसका अवशेष वर्ष 2018 तक मौजूद था. इसके बाद से वन विभाग की कोई टीम यहां नहीं गयी है. वर्ष 2001-02 में नक्सलियों ने इस क्षेत्र को अपना बेस कैंप बनाया था. खुद को सुरक्षित रखने के लिए नक्सलियों ने उस इलाके में जगह-जगह आइइडी प्लांट करने के साथ ही जमीन के अंदर दर्जनों बंकर बना रखे हैं, जब भी सुरक्षाबलों की ओर से उन पर हमला किया जाता है, वे बंकरों में छिप जाते हैं.
टीम के यात्रा के पड़ाव
14 अप्रैल: मनोहरपुर और आसपास का इलाका
प्रभात खबर की टीम ने 14 अप्रैल को पहले पश्चिम सिंहभूम (चाईबासा) जिले के मनोहरपुर और आसपास के इलाकों का जायजा लिया. रात साढ़े नौ बजे तक दुकानें और होटल बंद हो गए. सिर्फ मोहनपुर नदी से बालू का उठाव गाड़ियों द्वारा जारी दिखा.
15 अप्रैल : तिरिलपोशी स्थित सीआरपीएफ कैंप
टीम ने 15 अप्रैल को सारंडा स्थित सीआरपीएफ के जराइकेला कैंप और दीघा कैंप के रास्ते तिरिलपोशी स्थित सीआरपीएफ कैंप तक 70 किमी की यात्रा पूरी की. रास्ते में जर्जर पीसीसी पथ और तीखे मोड़ हैं. वहां से फिर यात्रा करते हुए टीम रात आठ बजे मनोहरपुर लौटी. इस यात्रा में जगह-जगह सीआरपीएफ के जवान मिले. उन्होंने सुझाव दिया कि पीसीसी पथ कभी मत छोड़िएगा. आइइडी का खतरा है.
16 अप्रैल : करमपदा जंगल वाया किरीबुरू
टीम मनोहरपुर से किरीबुरू के सेल माइंस के रास्ते करमपदा जंगल पहुंची. जहां आइइडी ब्लास्ट में सीआरपीएफ के सात जवान शहीद हुए थे. वहां से टीम थलकोबाद पहुंची. पूरा रास्ता घने जंगल और प्राकृतिक सौंदर्य से भरा था. एक युवक ने बताया कि पहले नक्सली आते थे. तीन साल पहले सीआरपीएफ कैंप बन जाने से राहत मिली है. लेकिन जगह-जगह आइइडी का खतरा बना रहता है. शाम होते ही हम लोग घरों में लौट आते हैं.
17 अप्रैल: किरीबुरू से छोटानागरा
टीम किरीबुरू से 24 किमी की की दूरी दरी पर पर स्थित छोटानागरा पहुंची. यहां स्थानीय दुकानदारों और आमलोगों से बात की. लेकिन नक्सल के खिलाफ लोगों ने चुप्पी साध ली. फिर यहां से आगे की 24 किमी की यात्रा पर बलिवा के लिए टीम रवाना हुई. रास्ते में मिले लोगों ने कहा कि पहले नक्सलियों का आतंक था, लेकिन उसुरिया और बलिवा में कैप बनने के बाद अब नक्सली जंगल में ही सिमट गये हैं. गांव में नक्सली दिखाई नहीं देते.
ड्रोन भी सारंडा के घने जंगल में हो रहे फेल
सुरक्षाबलों के अफसरों ने बताया कि नक्सलियों की टोह लेने के लिए हमलोग दो तरह के ड्रोन का इस्तेमाल करते हैं. एक है नेत्रा और दूसरा है स्वीच. लेकिन जंगल इतना घना और सीरियल पहाड़ियों से घिरा है कि दोनों तरह के ड्रोन से भी नहीं पता चलता है कि नक्सली क्षेत्र में हैं, तो कहां हैं. प्रभात खबर की टीम ने भी अपने ड्रोन का इस्तेमाल इलाके को समझने के लिए किया. इसमें सुरक्षाबलों की बात सही निकली. नक्सलियों की तलाश में जब कोबरा और सीआरपीएफ के जवान सर्च के दौरान दुर्गम जंगल के कच्चे रास्तों पर आगे बढ़ते हैं, तो उपकरण रहते हुए भी वे कई दफा आइइडी नहीं खोज पाते हैं. प्रेशर आइइडी जंगल में जहां-तहां नक्सलियों ने लगा रखे हैं. आइइडी के ऊपर से प्लास्टिक लगा दिया जाता है और उसके ऊपर सूखे पत्ते दो-तीन परतों में रख देते हैं.
इस जंगल में हैं 4.11 करोड़ के 41 इनामी नक्सली
सारंडा के मंकी फॉरेस्ट में फिलवक्त 4.11 करोड़ के 41 इनामी सहित कुल 53 नक्सली हैं. यह छोटे-छोटे ग्रुप में बंटकर मंकी फॉरेस्ट के इलाके में जगह बदलकर घूमते रहते हैं. अब ये स्थायी कैंप की जगह एक-दो दिनों के लिए अस्थायी कैंप लगा रहे हैं. जब तक सुरक्षाबल उनके पास पहुंचते हैं, तब तक नक्सली निकल चुके होते हैं.
दो पर एक-एक करोड़ का इनाम- माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर उर्फ सुनिर्मल जी उर्फ सागर और सेंट्रल कमेटी मेंबर असीम मंडल उर्फ आकाश.
दो पर 25-25 लाख का इनाम- माओवादी सैक मेंबर अजय महतो उर्फ टाइगर और सैक मेंबर मोचू उर्फ मेहनत उर्फ विभीषण.
चार पर 15 लाख का इनाम- माओवादी रीजनल कमेटी मेंबर मदन महतो उर्फ शंकर, संजय महतो उर्फ संतोष, रामप्रसाद मांझी उर्फ सचिन, बेला सरकार उर्फ पंचमी
सात पर 10-10 लाख का इनाम- माओवादी संगठन के जोनल कमांडर मृत्युंजय जी उर्फ फरेश, मनोहर गंझू उर्फ सोहन, गोदराय यादव उर्फ संजय, सालुका कायम उर्फ मारू, पुष्पा महतो उर्फ शकुंतला, चंदन लोहरा और मीता.
13 पर पांच-पांच लाख का इनाम- माओवादी संगठन के सबजोनल कमांडर अनिल तुरी, सुखलाल बिरजिया, समीर सोरेन, समीर महतो उर्फ मंगल, सुलेमान हांसदा, गुलशन सिंह मुंडा, जयंती उर्फ रेखा, प्रभात मुंडा उर्फ मुखिया, पंकज कोरवा, बिरेंद्र सिंह उर्फ सागर, सागेन अंगरिया, राजू भुइयां, रामदेव लोहरा उर्फ साधु.
छह पर दो-दो लाख का इनाम- एरिया कमांडर करण उर्फ डांगुर, मीना, मालती मुर्मू, सोनाराम उर्फ सुदेश, बलराम लोहरा, बाबूलाल जी.
सात पर एक-एक लाख का इनाम- माओवादी दस्ता सदस्य बुधन लोहरा, इसराइल पूर्ति, बासु पूर्ति, बसंती जेराई, फुलमनी कोड़ा, कोदामुनी कोड़ा, चोगो पूर्ति उर्फ गुरुचरण.
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