चक्रधरपुर : अल्लाह ने अपने बंदों को दुनिया में एक मकसद से भेजा है. अल्लाह ने पूरी उम्मत ए मुसलिमा पर ये जिम्मेदारी दी है कि वो एक उम्मत की हैसियत से खुदा के पैगाम को पूरी दुनिया तक पहुंचाये. उलमा चूंकि अंबिया के बाद उनके वारिस की हैसियत रखते हैं, तो उन्हें दीन में […]
By Prabhat Khabar Digital Desk | Updated at :
चक्रधरपुर : अल्लाह ने अपने बंदों को दुनिया में एक मकसद से भेजा है. अल्लाह ने पूरी उम्मत ए मुसलिमा पर ये जिम्मेदारी दी है कि वो एक उम्मत की हैसियत से खुदा के पैगाम को पूरी दुनिया तक पहुंचाये. उलमा चूंकि अंबिया के बाद उनके वारिस की हैसियत रखते हैं, तो उन्हें दीन में बशीरत हासिल करके कौम के लिए एक नजीर (आदर्श) बनना है.
आम मुसलमानों की जिम्मेदारी है कि उन्हें खुद दीन पर अमल करने के साथ-साथ अपने गिर्दोपेश में भी भलाई की दावत देते रहना है और बुराई रोकते रहना है. दीन की दावत देने का तरीका हमें कुरआन ने सिखाया है. अल्लाह सूरह नहल में फरमाता है कि दीन की तरफ हमेशा हिकमत (तत्वदर्शिता) के साथ बुलाना चाहिए और जब भी नसीहत की जरूरत पेश आये तो हमेशा अच्छी नसीहत करनी चाहिए.
दीन की दावत के दौरान ये अंदेशा भी रहता है कि कई बार बहस की नौबत आ जाती है, कोई ऐतराज करता है तो कोई सवाल उठाता है, इसलिए इसमें भी हमें ये हिदायत की गयी है कि कभी बहस भी हो जाये तो हमेशा विनम्र ही रहना चाहिए, बात इस तरह से होनी चाहिए कि उसमें कोई तल्खी न हो, कोई लान तान न हो,
गाली-गलौज न हो, कोई फतवेबाजी न हो बल्कि अच्छे उसलूब में अपना मत व्यक्त किया जाना चाहिए. बात समझाने के लिए होनी चाहिए न कि थोपने या मनवाने के लिए और ना ही अपने इल्म की शेखी बगारने के लिए. जिस वक्त दीन की बात हो रही हो तो हमें सामने वाले के बारे में हुस्न ए जन (अच्छी सोच) रखना चाहिए, उनको नेक नीयत समझ कर बात करनी चाहिए, अपनी बात इस तरह पहुंचानी है कि दिल जीतना है, दिल और दिमाग पर प्रभाव डालना हैं. हमारा काम सिर्फ ये है कि हम खुदा का पैगाम निहायत खूबी के साथ लोगों तक पहुंचा दें. (सूरह यासीन)