Tribalpedia: दीवानी अधिकार से जंगलों तक, इलाहाबाद की संधि ने कैसे बदली आदिवासी दुनिया?

12 अगस्त 1765 की इलाहाबाद संधि ने ईस्ट इंडिया कंपनी को सिर्फ राजनीतिक प्रभाव नहीं दिया, बल्कि बंगाल, बिहार और ओडिशा से राजस्व वसूलने की ताकत भी दी. यही आर्थिक शक्ति आगे कंपनी के सैन्य विस्तार और पूर्वी भारत के आदिवासी इलाकों में बढ़ते हस्तक्षेप का आधार बनी.

जोहार. आज 9 अगस्त है. विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं.

12 अगस्त 1765 की इलाहाबाद की संधि भारतीय इतिहास में केवल मुगल बादशाह और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ एक समझौता नहीं थी.

इसे उस मोड़ के रूप में देखा जा सकता है, जब कंपनी एक व्यापारिक संस्था से आगे बढ़कर राजस्व और प्रशासनिक शक्ति हासिल करने लगी.

इसका सबसे गहरा असर पूर्वी भारत- बंगाल, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा के बड़े हिस्सों, पर पड़ा और धीरे-धीरे इसका प्रभाव उन आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंचा, जो लंबे समय तक अपेक्षाकृत स्वायत्त रहे थे.

शाह आलम द्वितीय से कंपनी तक पहुंची राजस्व की ताकत

1765 में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय और रॉबर्ट क्लाइव के बीच हुई इलाहाबाद की संधि के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा की दीवानी, यानी राजस्व वसूली का अधिकार मिला.

यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण था.

अब कंपनी के पास व्यापार से होने वाली आमदनी के अलावा एक विशाल भूभाग से नियमित राजस्व जुटाने का अधिकार था. यही राजस्व आगे कंपनी की सेना, प्रशासन और नए क्षेत्रों में विस्तार का आर्थिक आधार बना.

यानी कंपनी ने पहले व्यापार से धन कमाया और फिर उसी धन से सत्ता का विस्तार किया.

झारखंड का बड़ा हिस्सा उस समय अलग प्रशासनिक राज्य के रूप में मौजूद नहीं था. इसलिए आज के झारखंड के कई क्षेत्र बंगाल और बिहार की तत्कालीन प्रशासनिक संरचनाओं के भीतर आते थे. इसका अर्थ यह हुआ कि कंपनी की राजस्व और प्रशासनिक व्यवस्था धीरे-धीरे आदिवासी इलाकों तक पहुंचने लगी.

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बंगाल से शुरू हुआ कंपनी राज, फिर बढ़ता गया दायरा

पूर्वी भारत कंपनी के लिए केवल राजस्व का स्रोत नहीं था. यह आगे के औपनिवेशिक विस्तार का आधार भी बना.

Regulating Act, 1773 के बाद बंगाल प्रेसिडेंसी की राजनीतिक-प्रशासनिक स्थिति और मजबूत हुई. बंगाल अब कंपनी की शक्ति का प्रमुख केंद्र बन चुका था.

इसके बाद सैन्य शक्ति और कूटनीति के जरिए कंपनी ने भारत के दूसरे हिस्सों में भी अपना प्रभाव बढ़ाया.

चौथा एंग्लो-मैसूर युद्ध (1799) और दूसरा एंग्लो-मराठा युद्ध (1803-05) इसी विस्तारवादी दौर की महत्वपूर्ण घटनाएं थीं. लॉर्ड वेलेजली की नीति ने कंपनी की सर्वोच्चता स्थापित करने की प्रक्रिया को और तेज किया.

इस विस्तार का असर केवल राजाओं और बड़ी रियासतों तक सीमित नहीं था.

आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंची नई राजस्व व्यवस्था

पूर्वी भारत के जंगल और पहाड़ी इलाके कंपनी के लिए एक अलग तरह की चुनौती थे.

यहां आदिवासी समुदायों की सामाजिक व्यवस्था, भूमि उपयोग और संसाधनों पर अधिकार स्थानीय परंपराओं से संचालित होते थे. लेकिन कंपनी के लिए भूमि मुख्य रूप से राजस्व का स्रोत थी.

यहीं से टकराव की जमीन तैयार हुई.

Jungle Mahal इसका एक उदाहरण था. 1805 में इससे जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्था के जरिए कंपनी ने जंगल और सीमावर्ती क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की कोशिश की.

बाद में संथाल क्षेत्र में Damin-e-Koh की प्रक्रिया सामने आई. यहां 1824 में सर्वे शुरू हुआ और 1832 में क्षेत्र की औपचारिक घोषणा की गई. इस प्रक्रिया में भूमि, आबादी और राजस्व प्रशासन को अधिक व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने की कोशिश हुई.

लेकिन आदिवासी समाज के लिए जंगल और जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं थे.
वे जीवन, संस्कृति और सामुदायिक पहचान का आधार थे.

जमीन से राजस्व तक और राजस्व से नियंत्रण तक

कंपनी की व्यवस्था का मूल तर्क था- भूमि को मापो, अधिकार तय करो और राजस्व वसूलो.

लेकिन आदिवासी इलाकों में जमीन का संबंध अक्सर सामुदायिक परंपराओं और स्थानीय अधिकारों से था. इसलिए जब बाहरी प्रशासन ने जमीन को कागज, सर्वे और राजस्व की इकाई में बदलना शुरू किया, तो पुराने सामाजिक संतुलन पर असर पड़ा.

यही वह लंबी प्रक्रिया थी जिसने आगे चलकर आदिवासी असंतोष की कई परिस्थितियां पैदा कीं.

बाद के प्रशासनिक दौर में विलियम बेंटिक जैसे गवर्नर-जनरल और अधिकारियों तथा सर्वेक्षण-प्रशासन से जुड़े लोगों ने इस व्यापक औपनिवेशिक व्यवस्था को आगे बढ़ाया. J.B. Bard और Tanner जैसे नाम भी इस प्रशासनिक-सर्वेक्षण संदर्भ में सामने आते हैं.

इलाहाबाद की संधि का असली महत्व

इलाहाबाद की संधि को इसलिए केवल 1765 की एक राजनीतिक घटना मानना अधूरा होगा.

इसने कंपनी को राजस्व दिया, राजस्व ने सेना को ताकत दी, सेना ने नए क्षेत्रों पर नियंत्रण बढ़ाया और प्रशासन ने उस नियंत्रण को स्थायी बनाने की कोशिश की.

पूर्वी भारत में शुरू हुई यह प्रक्रिया धीरे-धीरे जंगलों और आदिवासी इलाकों तक पहुंची.

इसलिए ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की कहानी केवल दिल्ली, कलकत्ता या बड़े राजाओं की कहानी नहीं है. यह उन जंगलों और गांवों की भी कहानी है, जहां पहली बार किसी बाहरी सत्ता ने जमीन को समुदाय की विरासत के बजाय राजस्व की इकाई के रूप में देखना शुरू किया.

और यहीं से औपनिवेशिक सत्ता बनाम आदिवासी स्वायत्तता के बीच लंबे संघर्ष की नींव पड़ी.

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लेखक के बारे में

By अचल प्रियदर्शी

अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 32 पुस्तकों के लेखक हैं.

उन्होंने केंद्रीय मंत्री के राजनीतिक सहायक के तौर पर काम किया है, तथा ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI)- रांची और झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ भी कार्य किया है.

उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक Tribal Bravehearts के लिए शब्द-शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया. शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है.

ये उनकी कुछ लोकप्रिय किताबें हैं;

  1. Pakistan State, Armed Influenconomy (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  2. बिहार जनादेश 2025 (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  3. International Relations: UPSC & State Civil Services Examinations (Oakbridge Publishing) (2026)

  4. ब्रांड हेमंत (स्वतंत्र प्रकाशन) (2025)

  5. झारखण्ड की जनजाति समाज और समय का संकट (प्रकाशन संसथान) (2026)

  6. जनजातीय शूरवीर (प्रभात प्रकाशन) (2026)

  7. Know Your State: Jharkhand (अरिहंत प्रकाशन) (2025)

  8. उत्तर प्रदेश सामान्य ज्ञान (क्राउन पुब्लिकेशन्स) (2024)

  9. बिहार सामान्य ज्ञान (उपकार प्रकाशन) (2024)

  10. International Relations for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

  11. Internal Security & Disaster Management for UPSC Mains (Pratiyogita Darpan) (2024)

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