300 वर्षों से आस्था का केंद्र है बरसलोया का जगन्नाथ मंदिर

सिमडेगा के बरसलोया में स्थित 300 साल पुराने जगन्नाथ मंदिर की महिमा और उससे जुड़ी चमत्कारी कथा के बारे में विस्तार से जानें। यहाँ भक्तों की हर मुराद पूरी होती है।

कोलेबिरा: प्रखंड के बरसलोया गांव स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर करीब 300 वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि महाप्रभु की दिव्य लीला का प्रतीक भी माना जाता है. मंदिर से जुड़ी एक प्रचलित कथा आज भी लोगों के बीच श्रद्धा और विश्वास के साथ सुनाई जाती है.

बताया जाता है कि मंदिर के पूर्व मुख्य पुजारी स्वर्गीय बंसीधर पंडा के दादाजी ने भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलदेव और माता सुभद्रा की प्रतिमाओं को बरसलोया से लचरागढ़ ले जाकर स्थापित करने का संकल्प लिया था. उस समय सड़क और यातायात की कोई सुविधा नहीं थी. उन्होंने भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा को पीठ पर बांधा, बलदेव की प्रतिमा को गोद में उठाया, जबकि माता सुभद्रा की प्रतिमा को बरसलोया में ही छोड़ दिया और पैदल यात्रा शुरू की. रास्ते में बड़केतूंगा गांव के समीप स्थित डॉल बगीचा में थकान के कारण उन्होंने एक पेड़ के नीचे विश्राम किया. कुछ देर बाद जब उनकी नींद खुली तो चारों ओर अंधेरा छा चुका था. उन्होंने दोबारा यात्रा शुरू की लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि उनके कदम आगे बढ़ने के बजाय स्वतः पीछे की ओर जा रहे हैं. कई प्रयासों के बाद भी वे आगे नहीं बढ़ सके और अंततः पीछे-पीछे चलते हुए फिर बरसलोया गांव पहुंच गए.

स्थानीय मान्यता है कि तभी उन्हें यह एहसास हुआ कि भगवान जगन्नाथ स्वयं बरसलोया को ही अपना धाम बनाना चाहते हैं. इसके बाद भगवान जगन्नाथ और बलदेव की प्रतिमाओं को स्थायी रूप से बरसलोया में ही स्थापित कर दिया गया. तभी से यह मंदिर क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया. आज भी मंदिर में प्रतिवर्ष रथ यात्रा सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन होता है. जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि सच्चे मन से यहां दर्शन करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. बरसलोया का यह प्राचीन जगन्नाथ मंदिर आज भी श्रद्धा, विश्वास और जनआस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है.


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Author: Ravikant

Published by: Sweta Vaidya

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