झारखंड के लाल को आज मिलेगा भारतीय हॉकी का सर्वोच्च सम्मान
भारत को आजादी मिलने से छह महीने 19 दिन पहले और भारत के गणतांत्रिक राष्ट्र बनने से तीन साल पहले सिमडेगा के केरसई प्रखंड के एक अतिपिछड़े गांव में जन्मे एक बच्चे ने हॉकी स्टिक से शानदार खेल का प्रदर्शन किया. वर्ष 1980 में मॉस्को ओलिंपिक में आखिरी बार ग्लोड मेडल जीतनेवाली भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा बना. अब जाकर सेना के इस जवान और सिमडेगा के लाल सिलवानुस डुंगडुंग को भारत सरकार हॉकी में उनके योगदान के लिए भारतीय हॉकी का सर्वोच्च सम्मान मेजर ध्यानचंद अवॉर्ड देने जा रही है. महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी नयी दिल्ली में उन्हें सोमवार को सम्मानित करेंगे. झारखंड में हॉकी के भीष्म पितामह कहे जानेवाले सिलवानुस की इस उपलब्धि पर सिर्फ सिमडेगा को ही नहीं, पूरे झारखंड को गर्व है. सिलवानुस के अपने गांव से निकल कर सेना में पहुंचने और उसके बाद के सफर के बारे में बता रहे हैं रविकांत साहू.
सिमडेगा जिला के केरसई प्रखंड मुख्यालय से लगभग आठ किलोमीटर दूर है ठेसु टोली गांव. इसी गांव में जन्मे सिलवानुस डुंगडुंग को सोमवार (29 अगस्त, 2016) को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी उन्हें नयी दिल्ली में मेजर ध्यानचंद अवॉर्ड के सम्मानित करेंगे. यह हॉकी का सर्वोच्च सम्मान है. इससे झारखंड का हर हॉकी खिलाड़ी, सिलवानुस के परिवार का हर सदस्य, सिमडेगा जिले के लोगों के साथ-साथ पूरा झारखंड खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा है. लेकिन, सिलवानुस और उनके गांव के आसपास के कई इलाकों के लोगों को इस बात का मलाल है कि उनके गांव में आज भी अच्छी सड़क नहीं है.
लोगों को उम्मीद थी कि पंचायत चुनाव के बाद उनके गांव की तसवीर बदलेगी, लेकिन छह वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी उम्मीदें अधूरी हैं. झारखंड में हॉकी के भीष्म पितामह कहे जानेवाले सिलवानुंस डुंगडुंग के गांव की सड़कें आज भी बदहाल हैं. बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है. सिलवानुस को अफसोस है कि सिमडेगा के जिला बनने के बाद ही उन्होंने डीसी को एक आवेदन दिया था, िजसमें आग्रह किया था कि उनके गांव तक की सड़क को ठीक करवा दिया जाये, लेकिन इस पर अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई.
आज एक खिलाड़ी यदि कोई मेडल जीतता है, तो उस पर पैसों की बारिश होती है. समाज और सरकार उसे पलकों पर बिठा लेता है. लेकिन, गोल्ड मेडल जीतनेवाली टीम का हिस्सा रहे सिलवानुस के आवेदन पर प्रशासन ने कार्रवाई नहीं की. उन्होंने अपने लिए कुछ मांगा भी नहीं था. उनकी इच्छा थी कि उनके गांव तक की सड़क थोड़ी अच्छी बन जाये. सिमडेगा जब अलग जिला बना, तो उन्होंने उपायुक्त को इस संबंध में आवेदन दिया, लेकिन आज तक वह सड़क नहीं बनी. जर्जर सड़क की वजह से वह अपने गांव नहीं जा पाते. उनका दर्द है कि क्षेत्र में उनके जैसे न जाने कितने और लोग होंगे, जो खस्ताहाल सड़क के कारण अपने लोगों से नहीं मिल पाते. ठेसु टोली से केरसई जानेवाली दोनों सड़कें अत्यंत जर्जर हैं. इस पर पैदल चलना भी मुश्किल है.
