सरायकेला.
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के भारत भवन में आयोजित “महाभारत : कालजयी सभ्यता की महागाथा” कार्यक्रम के अंतर्गत सरायकेला छऊ की भव्य प्रस्तुति उरुभंगम नृत्य नाट्य के माध्यम से की गयी. इस प्रस्तुति में महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत के कौरवों और पांडवों के बीच धर्म व अधर्म के महायुद्ध की कथा को सशक्त रूप में मंचन किया गया. 16 से 24 जनवरी तक चलने वाले इस महोत्सव का उद्घाटन 16 जनवरी को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने किया. कार्यक्रम में जापान, इंडोनेशिया और श्रीलंका सहित देश-विदेश के कई विख्यात रंग समूह भाग ले रहे हैं.सरायकेला छऊ की उरुभंगम प्रस्तुति ने मोहा मन
छऊ नृत्य कला केंद्र, सरायकेला-खरसावां एवं रजतेंदु छऊ कला निकेतन के एसएनए अवॉर्डी गुरु तपन कुमार पटनायक तथा वरीय फेलो रजतेंदु रथ के निर्देशन में महाभारत के प्रमुख प्रसंगों की मनमोहक प्रस्तुति दी गयी. उरुभंगम में द्रौपदी चीरहरण, द्रोणाचार्य व कर्ण का दुखद अंत तथा दुर्योधन के अहंकार पर भीम की गदा के प्रहार का सजीव चित्रण दर्शकों को भावविभोर कर गया. बीर भारत न्यास एवं मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित लगभग एक घंटे के इस कार्यक्रम में सूत्रधार की भूमिका गुरु तपन कुमार पटनायक ने निभायी. श्रीकृष्ण की भूमिका में संजय कर्मकार, यज्ञसिनी में कुसुमी पटनायक, द्रौपदी में परि, भीष्म में रजतेंदु रथ, भीम में वरीय फेलो निवारण महतो, दुर्योधन में काली प्रसन्न षाड़ंगी, द्रोणाचार्य में गणेश परिछा, अर्जुन में सनथ कुमार साहू तथा कर्ण की भूमिका में होली कुम्हार ने उत्कृष्ट अभिनय किया. सैनिकों की भूमिका बिजेन सरदार, बुद्धेश्वर कुमार और बैसाखू सरदार ने निभायी. वाद्य संयोजन में बांसुरी पर वरीय फेलो देवराज दुबे ने मनोहारी राग प्रस्तुत किया, वहीं ढोल पर बाबूराम सरदार और वरीय फेलो पूर्ण सरदार ने सशक्त संगत दी. नृत्य निदेशक गुरु तपन कुमार पटनायक ने कहा कि महाकाव्य महाभारत हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है, जो न केवल धार्मिक आस्था बल्कि भारत के सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का भी जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है.
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