सरायकेला से प्रताप मिश्रा की रिपोर्ट
Chhau Dance Festival: झारखंड की सांस्कृतिक विरासत में छऊ नृत्य का विशेष स्थान है. खासकर, सरायकेला का छऊ न केवल विश्व प्रसिद्ध एक लोकनृत्य है, बल्कि यहां के धार्मिक विश्वास, परंपरा और लोक पर्व से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. इसी विषय को लेकर सरायकेला रियासत के राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने प्रेस कांफ्रेंस कर छऊ नृत्य और चैत्र पर्व के महत्व पर विस्तार से अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि सरायकेला में छऊ नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह यहां की धार्मिक आस्था और पारंपरिक पूजा-पाठ से जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजन है. इसलिए इसे महोत्सव के रूप में नहीं, बल्कि पारंपरिक चैत्र पर्व के रूप में मनाया जाना चाहिए.
चैत्र पर्व के साथ जुड़ी है छऊ नृत्य की परंपरा
राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने कहा कि सरायकेला में हर साल अप्रैल माह में चैत्र पर्व के अवसर पर पारंपरिक पूजा-पाठ के बाद छऊ नृत्य का आयोजन किया जाता है. यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़ी हुई है. उन्होंने कहा कि चैत्र पर्व को पूर्व की तरह ही एक दिवसीय पारंपरिक पर्व के रूप में मनाया जाना चाहिए. वहीं जिला स्थापना दिवस 30 अप्रैल को अलग से महोत्सव के रूप में मनाया जा सकता है, जिसमें विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो.
राज्य गठन के बाद चैत्र पर्व को मिला महोत्सव का रूप
राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने कहा कि जब झारखंड अलग राज्य नहीं था और यह क्षेत्र बिहार का हिस्सा था, तब चैत्र पर्व को पारंपरिक तरीके से ही मनाया जाता था. उस समय यह केवल धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होता था. उन्होंने बताया कि झारखंड राज्य बनने के बाद इस पर्व को धीरे-धीरे महोत्सव का रूप दे दिया गया. कई बार इस आयोजन में अन्य राज्यों की लोक कलाओं और नृत्यों को भी शामिल किया जाने लगा, जिससे स्थानीय छऊ नृत्य की प्रमुखता कम होने लगी. उन्होंने कहा कि यह स्थिति ठीक नहीं है, क्योंकि छऊ नृत्य सरायकेला की पहचान है और इसे ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
दूसरे राज्यों के कलाकारों को बुलाने पर जताई आपत्ति
प्रेस कांफ्रेंस के दौरान राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने कहा कि महोत्सव के नाम पर कई बार दूसरे राज्यों के कलाकारों को बुलाया जाता है, जिससे स्थानीय कलाकारों को पर्याप्त मंच नहीं मिल पाता. उन्होंने कहा कि छऊ नृत्य विश्व प्रसिद्ध है और इसकी पहचान केवल सरायकेला तक सीमित नहीं है. यह कला सात समंदर पार तक अपनी पहचान बना चुकी है. इसलिए स्थानीय कलाकारों और परंपराओं को प्राथमिकता देना जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक आस्था से जुड़े इस आयोजन में परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस संस्कृति से जुड़ी रहें.
प्रशासन को दिया गया वैकल्पिक प्रस्ताव
राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने बताया कि हाल ही में चैत्र पर्व के आयोजन को लेकर अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) की अध्यक्षता में एक बैठक आयोजित की गई थी. इस बैठक में यह सुझाव दिया गया कि छऊ महोत्सव का आयोजन अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस यानी 29 अप्रैल को किया जाए. हालांकि, उन्होंने प्रशासन को प्रस्ताव दिया है कि 13 अप्रैल को केवल पारंपरिक छऊ नृत्य का आयोजन किया जाए और उसी दिन चैत्र पर्व मनाया जाए. इससे इस पर्व की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को अक्षुण्ण रखा जा सकेगा.
इसे भी पढ़ें: झारखंड के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में खून की कमी, दर-दर भटक रहे मरीजों के परिजन
राजमहल में अलग से मनाया जाएगा चैत्र पर्व
राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने कहा कि यदि जिला प्रशासन उनके प्रस्ताव से सहमत नहीं होता है, तो राजमहल में अलग से चैत्र पर्व का आयोजन किया जाएगा. उन्होंने बताया कि राजमहल परिसर में 13 अप्रैल को पारंपरिक तरीके से छऊ नृत्य का आयोजन किया जाएगा, जिसमें स्थानीय कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे. इसके बाद 14 अप्रैल को पाट संक्रांति के अवसर पर इस आयोजन का समापन किया जाएगा. उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य सरायकेला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और छऊ नृत्य की परंपरा को सुरक्षित रखना है. साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि यह अनमोल लोक कला आने वाली पीढ़ियों तक उसी गरिमा और परंपरा के साथ पहुंचती रहे.
इसे भी पढ़ें: झारखंड में नशे के कारोबारियों की बढ़ेंगी मुश्किलें, जिलों में स्पेशल टास्क फोर्स बनाएगी सरकार
