15 साल की उम्र में बदली जिंदगी की राह...जानिए कैसे बना सागर 5 लाख का इनामी नक्सली

महज 15 साल की उम्र में घर छोड़कर माओवादी संगठन में शामिल होने वाले हार्डकोर नक्सली सागर सिंह सरदार की पूरी कहानी और उसके अपराधों के बारे में विस्तार से जानें.

प्रतिनिधि, चांडिल

जिस उम्र में बच्चे स्कूल की पढ़ाई और अपने सपनों में खोए रहते हैं, उसी उम्र में बेनाडीह गांव का सागर सिंह सरदार घर छोड़कर माओवादियों के साथ चला गया. करीब 15 साल की उम्र में उठाये गए इस कदम ने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी. देखते ही देखते वह प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) का सक्रिय सदस्य बना, फिर कमांडर तक पहुंचा और आखिरकार उसके सिर पर 5 लाख रुपये का इनाम घोषित हो गया. डेढ़ दशक से ज्यादा समय तक वह झारखंड और पश्चिम बंगाल के जंगलों में सक्रिय रहा. उसके खिलाफ हत्या, आगजनी और पुलिस पर हमले की साजिश जैसे कई गंभीर मामले दर्ज हैं.

पिता किताब खरीदने गये थे, सागर घर से निकलकर नक्सलियों के पास पहुंच गया

सागर सिंह सरदार टेंगाडीह पंचायत के बेनाडीह टोला निवासी राम सिंह का पुत्र है. परिजनों के मुताबिक, सागर की प्रारंभिक पढ़ाई उसके मामा के घर सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया स्थित एक स्कूल में हुई. बाद में पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वह किराये के कमरे में रहने लगा. गांव लौटने पर उसका नामांकन नीमडीह के रघुनाथपुर हाइस्कूल में कराया गया था. उसके पिता किताब लाने के लिए चांडिल निकले, तो वह घर से निकल गया और वापस नहीं लौटा. परिवार वालों ने काफी खोजबीन की, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला. करीब एक महीने बाद परिवार को उसके नक्सली संगठन से जुड़ने की जानकारी मिली. वर्ष 2008 में नक्सली दस्ते में पूरी तरह शामिल होने के बाद उसने कभी अपने पैतृक घर का रुख नहीं किया.

पश्चिम बंगाल की मीना पहाड़िया से की शादी

संगठन में सक्रिय रहने के दौरान सागर ने पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के अयोध्या पहाड़ क्षेत्र की आदिम जनजाति समुदाय की युवती मीना पहाड़िया से शादी कर ली. मीना भी बाद में माओवादी संगठन की सक्रिय सदस्य बन गयी. मीना पर दो लाख रुपये का इनाम घोषित है. वह झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमावर्ती जंगल क्षेत्रों में संगठन के लिए संदेश पहुंचाने, लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था करने और दस्तों को सहयोग देने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में शामिल रही है.

माले नेता समेत कई बड़ी हत्याओं का आरोपी रहा है सागर

सागर सिंह सरदार के खिलाफ नीमडीह, चांडिल, चौका, कुचाई, खरसावां और पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम सहित कई थानों में एक दर्जन से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं. उसका प्रभाव क्षेत्र दलमा से लेकर कोल्हान तक फैला था.

1. चेलियामा के माले नेता शंकर दास गोस्वामी की हत्या.

2. जाहेरडीह के जितेन सिंह की हत्या.

3. बामनी के अभिमन्यु दास की हत्या.

4. बुरुडीह के शिवराज सिंह की हत्या.

5. अगस्त 2008 में नीमडीह थाना क्षेत्र के फारेंगा में सड़क निर्माण कार्य में लगी मशीनों और डंपरों में आगजनी की घटना.

6. बुरुडीह में पुलिस-नक्सली मुठभेड़ में संलिप्तता.

हमले की योजना बनाने, आइइडी लगाने, नये कैडरों की भर्ती में अहम भूमिका थी सागर की

पुलिस के अनुसार, सागर सिंह का दस्ता दलमा और उसके आसपास के जंगलों में लंबे समय तक सक्रिय रहा. बाद में उसका नेटवर्क कोल्हान, सारंडा तथा झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा के जंगलों तक फैल गया था. वह प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) का रीजनल कमेटी सदस्य और कमांडर के पद पर रहा. वह शीर्ष माओवादी नेता मिसिर बेसरा और असीम मंडल उर्फ आकाश के नेटवर्क से जुड़ा हुआ था. सुरक्षा बलों पर हमले की योजना बनाने, आइइडी लगाने, नये कैडरों की भर्ती और संगठन के विस्तार में अहम भूमिका निभाता था.

वर्ष 2018 में कुर्क की गयी थी संपत्ति

सागर सिंह के खिलाफ पुलिस और प्रशासन ने पहले भी कार्रवाई की थी. वर्ष 2018 में बेनाडीह गांव में उसकी करीब 13 एकड़ 20 डिसमिल अचल संपत्ति कुर्क कर ली गयी थी. अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के आदेश पर तत्कालीन सरायकेला एसडीपीओ अविनाश कुमार और नीमडीह थाना प्रभारी प्रमोद कुमार सिंह के नेतृत्व में कार्रवाई की गयी थी. इस दौरान जमीन की पैमाइश कर वहां लाल झंडे लगाये गये थे. तत्कालीन सीओ जयवंती देवगम दंडाधिकारी के रूप में मौजूद थीं.

मुख्यधारा में लौटाने के प्रयास रहे असफल

सागर को नक्सली गतिविधियां छोड़कर मुख्यधारा में वापस लाने के लिए परिवार के साथ-साथ पुलिस-प्रशासन की ओर से भी कई स्तर पर प्रयास किये गये थे. दलमा, पटमदा, चाईबासा और खरसावां समेत विभिन्न इलाकों में उसकी तलाश की गयी, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. परिवार को लंबे समय तक उसके बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पायी थी.

खेती पर निर्भर है सागर का परिवार

वर्तमान में सागर का परिवार बेनाडीह गांव में रहता है. परिवार के छह सदस्य अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह खेती-बाड़ी पर निर्भर हैं. परिजनों का घर कच्चा है. गांव तक पहुंचने वाली सड़क लंबे समय से कच्ची है. परिजनों ने बताया कि उन्हें जानकारी नहीं कि सागर किन परिस्थितियों में नक्सली संगठन से जुड़ा था.


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लेखक के बारे में

By प्रताप कुमार मिश्रा

प्रताप कुमार मिश्रा वर्ष 2003 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्होंने कोल्हन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक किया है. राजनीतिक, सामाजिक, क्राइम, खेल की खबरों में इन्हें विशेषज्ञता हासिल है. डिजिटल जर्नलिज्म में 10 साल का अनुभव है.

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