संवाददाता, खरसावां स्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों के पवित्र जल से महास्नान के बाद अस्वस्थ हुए महाप्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा इन दिनों मंदिर के अणवसर गृह (इलाज कक्ष) में हैं. जहां उनकी गुप्त सेवा और पारंपरिक उपचार चल रहा है. खरसावां की प्राचीन धार्मिक परंपरा के अनुसार, अणवसर दशमी पर भगवान को जंगल की 10 दुर्लभ जड़ी-बूटियों से तैयार ''दशमूल औषधि'' अर्पित की जायेगी. मान्यता है कि इस आयुर्वेदिक काढ़े के सेवन के बाद महाप्रभु के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार होने लगता है.
अणवसर काल में गुप्त सेवा और फल-मूल का भोग
अणवसर काल के दौरान भगवान जगन्नाथ भक्तों को सार्वजनिक दर्शन नहीं देते हैं. इस पूरी अवधि में केवल सेवायत ही विशेष धार्मिक नियमों के अनुसार प्रभु की गुप्त सेवा करते हैं. बीमारी के कारण इस दौरान भगवान को अन्न का भोग नहीं लगाया जाता, बल्कि केवल फल और मूल (कंद-मूल) का ही सात्विक भोग अर्पित किया जाता है. यह अनूठी परंपरा हर साल स्नान पूर्णिमा से शुरू होकर नेत्र उत्सव तक पूरी निष्ठा के साथ निभायी जाती है.
200 वर्षों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी दवा तैयार कर रहा राजवैद्य परिवार
भगवान जगन्नाथ के लिए इस विशेष दशमूल औषधि को तैयार करने का जिम्मा खरसावां के कुम्हारसाही स्थित ''दाश परिवार'' के पास है. लगभग 200 वर्षों से भी अधिक समय से यह राजवैद्य परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस पावन सेवा से जुड़ा हुआ है. पूर्व में दाशरथी दाश, गोकुल चंद्र दाश, उमाशंकर दाश और सत्य किंकर दाश ने इस परंपरा को जीवित रखा. वर्तमान में निरंजन दाश ''पिंकू'' इस गुरुतर दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि इस पवित्र दवा को बनाने के लिए कई दिनों तक जंगलों की खाक छाननी पड़ती है, तब जाकर दुर्लभ जड़ी-बूटियां एकत्र हो पाती हैं.
10 दुर्लभ वनस्पतियों का अनूठा संगम, ''कृष्ण परणी'' है सबसे खास
आयुर्वेद में विशेष महत्व रखने वाली इस दशमूल औषधि में मुख्य रूप से दस वनस्पतियों का उपयोग किया जाता है. इसमें कृष्ण परणी, शाल परणी, अगिबथु, फणफणा, पाटेली, गोखरा, बेल, गम्हारी, लबिंग कोली और अंकरांती शामिल है. ये जड़ी-बूटियां शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और बुखार जैसी समस्याओं से राहत देने में अचूक मानी जाती हैं. निरंजन दाश ने बताया कि इनमें ''कृष्ण परणी'' सबसे दुर्लभ जड़ी-बूटी है, जो आसानी से नहीं मिलती है. पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद महाप्रभु 14 जुलाई को ''नेत्र उत्सव'' पर नवयौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे. इसके बाद 16 जुलाई को भव्य रथयात्रा आयोजित होगी, जिसमें भगवान रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) के लिए प्रस्थान करेंगे.
