खरसावां : उम्र 77 वर्ष, लेकिन जज्बा जवान है. हाथों में तिरंगा आते ही पूर्व सैनिक गुरुचरण चौड़ा की आंखों में करीब पांच दशक पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं. उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध में 13 दिनों तक त्रिपुरा सीमा पर कठिन परिस्थितियों में साथियों के साथ मोर्चा संभाला था. देश की रक्षा के लिए आज उनके हाथ में भले राइफल नहीं है, लेकिन देशसेवा का जज्बा वही है. वे गांव के युवाओं को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहे हैं.
20 साल की उम्र में पहनी वर्दी, देशसेवा को बनाया लक्ष्य
सरायकेला-खरसावां जिले के कुचाई प्रखंड स्थित बायांग गांव निवासी गुरुचरण चौड़ा ने साल 1969 में महज 20 वर्ष की उम्र में भारतीय सेना में सिपाही के रूप में योगदान दिया. गांव में सेना की वर्दी में एक सैनिक को देखकर उनके मन में देश सेवा की इच्छा जागी. 10वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सेना में जाने का फैसला किया. सेना में भर्ती होने के ढाई वर्ष बाद 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध छिड़ गया. उस समय वह माउंटेन डिवीजन सिग्नल रेजिमेंट में तैनात थे. उन्हें त्रिपुरा सीमा क्षेत्र में भेजा गया.
ड्राइवर की जिम्मेदारी, लेकिन राइफल लेकर संभाला मोर्चा
गुरुचरण की मूल जिम्मेदारी चालक की थी. लेकिन, युद्ध में उन्हें हथियार उठाकर मोर्चे पर भी उतरना पड़ा. हाथ में 7.62 एमएम राइफल और दिल में देश की रक्षा का संकल्प लेकर साथियों के साथ डटे रहे. उनकी रेजिमेंट का महत्वपूर्ण काम दुर्गम और पहाड़ी इलाकों में तैनात सैन्य इकाइयों के बीच संचार व्यवस्था को मजबूत रखना था. युद्ध में वायरलेस और संकेतों के जरिए संदेश पहुंचाना रणनीति का अहम हिस्सा था. ऐसे में हर संदेश और हर क्षण की अपनी कीमत थी.
भूख-प्यास भूलकर बस एक लक्ष्य था - देश की रक्षा
युद्ध के दिनों की कठिनाइयों को याद करते हुए गुरुचरण बताते हैं कि मोर्चे पर भोजन और पानी का कोई निश्चित समय नहीं था. कई बार दिन में केवल एक बार खाना मिल पाता था. भूख, थकान और कठिन परिस्थितियों के बावजूद जवानों का मनोबल कम नहीं हुआ. उस समय सामने सिर्फ एक लक्ष्य था- देश की रक्षा. यही सोच उन्हें आज भी गांव के युवाओं से जोड़ती है. उनका मानना है कि सेना या सुरक्षा बल में जाने के लिए केवल शारीरिक ताकत नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती, अनुशासन और कठिन परिस्थितियों में टिके रहने का साहस भी जरूरी है.
गांव में पहुंची शहीद होने की खबर, एक चिट्ठी ने लौटायी परिवार की खुशी
1971 के युद्ध की एक घटना आज भी गुरुचरण को भावुक कर देती है. संचार के सीमित साधनों के कारण उनके गांव में अफवाह पहुंच गयी कि वह युद्ध में शहीद हो गये हैं. परिवार और ग्रामीणों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा. गुरुचरण को अफवाह की कोई जानकारी नहीं थी. उन्होंने अपनी मां के नाम एक अंतरदेशीय पत्र भेजा, जिसमें युद्ध में भारत की जीत और अपने सकुशल होने की जानकारी दी. जब पत्र गांव पहुंचा, तो परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. युद्ध के बाद जब वह गांव लौटे, तो ग्रामीणों ने उनका जोरदार स्वागत किया. उनके लिए वह वापसी किसी उत्सव से कम नहीं था.
पूर्वी स्टार समेत 10 पदक मिले, हर पदक की है एक कहानी
1971 के युद्ध में भागीदारी के लिए गुरुचरण चौड़ा को पूर्वी स्टार पदक से सम्मानित किया गया. करीब 24 वर्षों की सैन्य सेवा में उन्हें अलग-अलग उपलब्धियों और सेवाओं के लिए कुल 10 पदक मिले. वह इन पदकों को बेहद संभालकर रखते हैं. 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर उन्हें अपने कोट पर सजाकर तिरंगे को सलामी देने पहुंचते हैं. ये पदक देश के प्रति निभायी जिम्मेदारी और जीवन के संघर्षों की अमूल्य यादें हैं.
देशसेवा को दी प्राथमिकता, सेवानिवृत्ति से दो साल पहले किया विवाह
गुरुचरण चौड़ा का जीवन युवाओं के लिए त्याग और समर्पण का उदाहरण है. करीब 22 वर्षों तक अविवाहित रहकर उन्होंने देश सेवा की. सेवानिवृत्ति से दो वर्ष पहले उन्होंने विवाह किया. लगभग 24 वर्षों की सैन्य सेवा के बाद गांव लौटे और परिवार के साथ खेती-बारी में जुट गये.
गांव के युवाओं के ‘वर्दी’ का सपना पूरा कराने में जुटे
सेवानिवृत्ति के बाद गुरुचरण ने युवाओं को तैयार करने का बीड़ा उठाया. पुलिस और सुरक्षा बलों में भर्ती की तैयारी करने वाले गांव के युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण देते हैं. उन्हें दौड़, अनुशासन और नियमित अभ्यास के साथ मानसिक रूप से मजबूत बनने की सीख देते हैं. गुरुचरण का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं में सेना और सुरक्षा बलों में जाने की पूरी क्षमता है. जरूरत केवल सही दिशा, अनुशासन और निरंतर मेहनत की है.
