खरसावां. देश की अधिकांश रियासतें इतिहास के पन्नों में सिमट चुकी हैं, लेकिन खरसावां में आज भी एक ऐसा ऐतिहासिक समझौता जीवंत है, जो आस्था, संस्कृति और परंपरा को संरक्षित कर रहा है. रियासतकाल में शुरू हुए धार्मिक व सांस्कृतिक अनुष्ठानों को आज भी पूरी शिद्दत से निभाई जा रही है. वर्ष 1947 में खरसावां रियासत के भारत संघ में विलय के समय हुए मर्जर एग्रीमेंट के तहत तत्कालीन राजपरिवार द्वारा संचालित धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों को सरकार द्वारा निरंतर जारी रखने का प्रावधान किया गया था. करीब आठ दशक बाद भी यह परंपरा अक्षुण्ण है. इसी कड़ी में राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए खरसावां के धार्मिक अनुष्ठानों, मंदिरों के रखरखाव और पूजा-पाठ हेतु 15 लाख रुपये का आवंटन किया है. इस राशि से ऐतिहासिक सरकारी रथयात्रा सहित दस प्रमुख धार्मिक आयोजनों का संचालन किया जाएगा.
प्रभु जगन्नाथ के रथ यात्रा पर है हैं पुरा फोकस
इस वर्ष भी सरकारी रथयात्रा को भव्य स्वरूप देने के लिए विशेष तैयारियां की जा रही हैं, जिसमें श्रीजगन्नाथ संस्कृति से जुड़े कई धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होंगे. रथ यात्रा पर होने वालें वाले विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक अनुष्ठान पर सरकारी फंड से करीब 3.70 लाख रुपये खर्च होंगे.
1948 में पहली बार मिला था सरकारी अनुदान
खरसावां में धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पहली बार वर्ष 1948 में तत्कालीन राज्य सरकार ने 5,587 रुपये का अनुदान उपलब्ध कराया था. इसके बाद समय-समय पर राशि में वृद्धि होती रही. वर्ष 2021-22 में 5.5 लाख, 2022-23 में 7.5 लाख, 2023-24 में 15.80 लाख तथा 2024-25 में 15 लाख रुपये का आवंटन मिला था. इस वर्ष भी सरकार ने 15 लाख रुपये स्वीकृत किए हैं.
सरकारी खर्च पर होते हैं 10 धार्मिक आयोजन
अंचलाधिकारी कप्तान सिंकू ने बताया कि विधि विभाग से प्राप्त राशि से चड़क पूजा, चैत्र पर्व, रथयात्रा, धुलिया जंताल पूजा, नुआखाई जंताल पूजा, इंद्रोत्सव, दुर्गा पूजा, काली पूजा, मुहर्रम तथा अन्य पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन कराया जाता है. इसके अलावा कुम्हारसाही स्थित मां पाउड़ी पीठ में प्रत्येक सप्ताह नियमित पूजा भी इसी मद से संपन्न होती है. मां पाउड़ी की साप्ताहिक पूजा पर प्रतिवर्ष लगभग 2.60 लाख रुपये खर्च किए जाते हैं, वहीं रथ यात्रा के धार्मिक व सांस्कृतिक अनुष्ठान पर करीब 3.70 लाख रुपये खर्च होते है.
मर्जर एग्रीमेंट से जुड़ी है परंपरा
खरसावां राजघराने के राजा गोपाल सिंहदेव बताते हैं कि रियासतकाल में इन सभी धार्मिक आयोजनों का खर्च राजकोष से वहन किया जाता था. 14 दिसंबर 1947 को खरसावां रियासत के भारत संघ में विलय के दौरान तत्कालीन राजा श्रीरामचंद्र सिंहदेव द्वारा भारत सरकार के गृह सचिव वीपी मेनन के साथ किए गए मर्जर एग्रीमेंट में यह व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी कि राजपरिवार द्वारा संचालित धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठानों का आयोजन आगे सरकार कराएगी. . उसी ऐतिहासिक समझौते के आधार पर आज भी धार्मिक व सांस्कृतिक इन आयोजनों के लिए सरकारी स्तर पर राशि उपलब्ध कराई जाती है. इसमें सभी समाज के आयोजनों को शामिल किया गया था. यही कारण है कि खरसावां की ऐतिहासिक रथयात्रा और अन्य धार्मिक परंपराएं दशकों बाद भी अपनी मूल पहचान के साथ जीवंत हैं.
