खरसावां. सरायकेला-खरसावां की ऐतिहासिक रथयात्रा में गुरुवार को एक बार फिर सदियों पुरानी राजपरंपरा जीवंत हो उठी. प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा शुरू होने से पहले राजघराने के प्रतिनिधियों ने पारंपरिक छेरा पहंरा की रस्म निभायी. इस धार्मिक अनुष्ठान के बाद ही महाप्रभु का रथ मौसीबाड़ी स्थित गुंडिचा मंदिर के लिए रवाना हुआ. रथयात्रा के दौरान इस अद्भुत परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. आजादी के बाद देशी रियासतों का भारत गणराज्य में विलय हो गया, लेकिन सरायकेला, खरसावां और हरिभंजा में राजवाड़ा काल से चली आ रही रथयात्रा की परंपराएं आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभायी जाती हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण परंपरा छेरा पहंरा की है. मान्यता है कि इस रस्म के बिना रथयात्रा प्रारंभ नहीं होती. छेरा पहंरा के दौरान राजघराने के प्रतिनिधि रथ के मार्ग पर चंदन मिश्रित जल का छिड़काव करते हैं तथा पारंपरिक रीति से झाड़ू लगाकर मार्ग को पवित्र करते हैं. यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भगवान के समक्ष सभी समान हैं और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है. सरायकेला में राजघराने के राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव, खरसावां में राज गोपाल नारायण सिंहदेव तथा हरिभंजा में राजेश सिंहदेव ने छेरा पहंरा की रस्म अदा कर वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया. धार्मिक अनुष्ठान पूरा होने के बाद श्रद्धालुओं के जयघोष के बीच भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा का रथ मौसीबाड़ी के लिए रवाना हुआ. रथयात्रा के दौरान पूरे मार्ग में भजन-कीर्तन, नृत्य और जय जगन्नाथ के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा. सदियों पुरानी इस परंपरा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि आधुनिक दौर में भी सरायकेला-खरसावां की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत पूरी जीवंतता के साथ सुरक्षित है.
छेरा पहंरा के साथ जीवंत हो उठी सदियों पुरानी परंपरा
सरायकेला-खरसावां की ऐतिहासिक रथयात्रा में छेरा पहंरा की रस्म के साथ सदियों पुरानी राजपरंपरा जीवंत हो उठी। जानिए इस अद्भुत धार्मिक अनुष्ठान की पूरी जानकारी।

हरिभंजा में रथ यात्रा के दौरान छेरा पोहरा रस्म को निभाते जमींदार परिवार के सदस्य संजय सिंहदेव और राजेश सिंहदेव | Prabhat Khabar Network