चांडिल: ‘आज तो रे करम राजा घरे दुआरे, कल तो रे करम राजा सांक नदीर उपारे...’ जैसे पारंपरिक करम गीतों की मधुर गूंज के साथ चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में करम पूजा की शुरुआत हो गयी है. रविवार को चांडिल, नीमडीह, कुकड़ू और ईचागढ़ प्रखंड के विभिन्न गांवों में करम पूजा को लेकर बालू उठाव की रस्म विधि-विधान से पूरी की गयी. कुंवारी युवतियों और महिलाओं ने नदी घाटों से बालू और धान के पौधों से सजी टोकरियां सिर पर उठाकर घर पहुंचायीं. इस दौरान करम गीतों और मांदर की थाप पर सामूहिक नृत्य से गांवों का माहौल उत्सवमय हो गया.
गीत गाते हुए नदी घाट से घर तक पहुंचीं महिलाएं
करम पर्व की तैयारियों के तहत युवतियां और महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में समूह बनाकर स्थानीय नदी घाटों पर पहुंचीं. पूजा-अर्चना के बाद उन्होंने टोकरियों में बालू और हरे-भरे धान के पौधे रखे और सिर पर उठाकर घर की ओर रवाना हुईं. रास्ते में जगह-जगह करम गीत गाते हुए युवतियां झूमती नजर आयीं. घर पहुंचने के बाद टोकरियों को आंगन में विशेष स्थान पर स्थापित किया गया. अब अगले चार दिनों तक महिलाएं और युवतियां इसके चारों ओर एकत्र होकर करम गीत गाएंगी और पारंपरिक अनुष्ठान करेंगी.
मंगलवार की रात गांवों में होगा करम जागरण
भादो शुक्ल एकादशी के अवसर पर मंगलवार को घर-घर और अखड़ा में करम देवता की पूजा-अर्चना होगी. परंपरा के अनुसार ग्रामीण ढोल-नगाड़ों और गीतों के साथ जंगल से करम वृक्ष की डाली लेकर आएंगे और उसे आंगन में स्थापित करेंगे. मंगलवार की रात करम जागरण होगा. इस दौरान पूरी रात पारंपरिक गीतों और झूमर नृत्य का दौर चलेगा. बुधवार को करम डाली का विधि-विधान से विसर्जन किया जायेगा.
प्रकृति, कृषि समृद्धि और नारी सम्मान से जुड़ा पर्व
करम पर्व झारखंड की लोक संस्कृति, प्रकृति प्रेम और कृषि जीवन से जुड़ा प्रमुख त्योहार है. लोकमान्यता के अनुसार, करम डाली को खेत में स्थापित करने से फसल की समृद्धि होती है और कीट-व्याधियों से फसल की रक्षा होती है. पर्व के दौरान बहनें भाइयों की दीर्घायु और परिवार की सुख-शांति की कामना करती हैं. व्रती महिलाएं टोकरियों को फल-पकवानों से सजाकर करम देवता को प्रसाद अर्पित करती हैं. इस तरह करम पर्व धार्मिक आस्था के साथ सामुदायिक एकजुटता, पारिवारिक रिश्तों और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है.
