सरायकेला से शचिंद्र कुमार दाश की रिपोर्ट
Sarhul Puja: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा के जमशेदपुर के घोड़ाबांधा स्थित आवास में शनिवार को पूरे पारंपरिक उल्लास और आस्था के साथ सरहूल पूजा का आयोजन किया गया. इस दौरान आदिवासी परंपराओं के अनुसार सभी धार्मिक अनुष्ठान विधिवत संपन्न किए गए. पूजा स्थल पर साल के पेड़ की डाली गाड़कर प्रकृति की आराधना की गई और पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना की गई. इस अवसर पर वातावरण पूरी तरह से उत्सवमय और आध्यात्मिक बना रहा.
परिवार के साथ पूजा कर की सुख-समृद्धि की कामना
सरहूल पूजा के अवसर पर अर्जुन मुंडा ने अपने परिवार के साथ मिलकर पूजा-अर्चना की. इस दौरान उनकी पत्नी डॉ मीरा मुंडा और पुत्र डॉ अभिषेक मुंडा समेत परिवार के अन्य सदस्य भी उपस्थित रहे. सभी ने पारंपरिक रीति के अनुसार अपने कानों में सरई यानी सखुआ के फूल लगाकर सरखोसी की परंपरा निभाई. पूजा के दौरान राज्य और देश की सुख-समृद्धि, शांति और कल्याण के लिए प्रार्थना की गई.
पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य से गूंजा परिसर
पूजा के बाद पूरे परिसर में पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य का आयोजन हुआ. सरहुल के इस उत्सव में मौजूद लोगों ने पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य और लोकगीतों के माध्यम से अपनी संस्कृति की झलक पेश की. सरई फूल लगाकर सरखोसी की परंपरा निभाने के साथ-साथ लोगों ने एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं भी दीं. इस दौरान माहौल पूरी तरह से आदिवासी संस्कृति के रंग में रंगा नजर आया.
सरहूल प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक : अर्जुन मुंडा
इस अवसर पर अर्जुन मुंडा ने कहा कि सरहूल केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह जनजातीय समाज की परंपराओं, सामुदायिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का जीवंत प्रतीक है. उन्होंने कहा कि यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है और जल, जंगल तथा जमीन की रक्षा करने का संदेश देता है. उन्होंने कहा कि झारखंड की सांस्कृतिक पहचान में सरहूल का विशेष महत्व है. यह पर्व समाज में एकता, भाईचारा और सहयोग की भावना को मजबूत करता है. साथ ही यह हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा भी देता है.
पर्यावरण संरक्षण का भी देता है संदेश
अर्जुन मुंडा ने कहा कि आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण, जंगलों की कटाई और जैव विविधता के संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है. ऐसे समय में सरहूल जैसे पारंपरिक पर्व हमें प्रकृति के साथ संतुलित और सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने की सीख देते हैं. उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा करना केवल आदिवासी समाज की ही नहीं, बल्कि पूरे समाज और मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है. हमारी पारंपरिक संस्कृति प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की शिक्षा देती है और यही विचार आज वैश्विक पर्यावरण संकट के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है.
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आदिवासी संस्कृति की समृद्ध विरासत का प्रतीक
उन्होंने कहा कि सरहूल पर्व झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के साथ गहरे संबंध का प्रतीक है. यह पर्व समाज में पारस्परिक सद्भाव, सहयोग और सामुदायिक एकता को मजबूत करता है. साथ ही आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का काम भी करता है. सरहूल के इस अवसर पर लोगों ने प्रकृति के प्रति आस्था और आदिवासी संस्कृति की समृद्ध परंपराओं को संरक्षित रखने का संकल्प भी लिया. पूरे आयोजन में पारंपरिक संस्कृति, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश स्पष्ट रूप से दिखाई दिया.
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