रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने प्रतिनियुक्ति पर लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. न्यायमूर्ति दीपक रौशन की अदालत ने छोटानागपुर रीजनल हैंडलूम वीवर्स को-ऑपरेटिव यूनियन के कर्मचारी संतोष कुमार की सेवा नियमित करने का आदेश देते हुए राज्य सरकार के अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया. अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी कर्मचारी से लगभग 25 वर्षों तक लगातार सरकारी विभाग में काम लेने के बाद उसे केवल प्रतिनियुक्ति का कर्मचारी मानकर नियमितीकरण से वंचित नहीं किया जा सकता.
1997 से समाज कल्याण विभाग में कर रहे थे सेवा
याचिकाकर्ता संतोष कुमार की नियुक्ति वर्ष 1983 में छोटानागपुर रीजनल हैंडलूम वीवर्स को-ऑपरेटिव यूनियन में हुई थी. बिहार सरकार की 1996 की नीति के तहत उन्हें 21 मार्च 1997 को समाज कल्याण विभाग में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया. बाद में विभाग ने प्रतिनियुक्त कर्मचारियों के समायोजन की प्रक्रिया शुरू की और उनका नाम भी भेजा गया, लेकिन उन्हें नियमित नहीं किया गया. वर्ष 2024 में सरकार ने उनका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उन्हें राज्य सेवा में समाहित नहीं किया जा सकता.
58 वर्ष में कर दिया सेवानिवृत्त
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि सहकारी संस्था ने कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष निर्धारित कर दी थी, लेकिन उन्हें 58 वर्ष की उम्र में ही सेवानिवृत्त कर दिया गया. इससे पहले उन्होंने नियमितीकरण और सेवा लाभ के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अदालत के निर्देश के बाद सरकार ने दोबारा उनके मामले पर विचार किया, लेकिन फिर भी उनका दावा अस्वीकार कर दिया, जिसके खिलाफ उन्होंने वर्तमान याचिका दायर की.
राज्य सरकार ने क्या दलील दी
राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि याचिकाकर्ता केवल प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए थे और उनकी सेवा अस्थायी प्रकृति की थी. सरकार ने यह भी तर्क दिया कि उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई थी और सेवा अभिलेखों में कुछ आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे. इसलिए नियमितीकरण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता.
हाईकोर्ट ने सरकार की दलील ठुकराई
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता ने 1997 से 2022 तक बिना किसी प्रत्यावर्तन आदेश के लगातार समाज कल्याण विभाग में सेवा दी. अदालत ने कहा कि यदि कर्मचारी की सेवा वास्तव में असंतोषजनक होती, तो उसे वर्षों पहले मूल विभाग में वापस भेजा जा सकता था. लेकिन ऐसा कभी नहीं किया गया. इसलिए सेवानिवृत्ति के बाद पहली बार सेवा को असंतोषजनक बताना मनमाना और कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है.
'संतोषजनक सेवा' का मतलब बेदाग सेवा नहीं
अदालत ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी नीति में नियमितीकरण के लिए "संतोषजनक सेवा" की बात कही गई है, "बेदाग सेवा" की नहीं. याचिकाकर्ता के खिलाफ हुई विभागीय कार्रवाई में केवल मामूली दंड दिया गया था. उन्हें न तो सेवा से हटाया गया और न ही अयोग्य घोषित किया गया. अदालत ने माना कि लगातार सेवा जारी रखना इस बात का प्रमाण है कि सरकार स्वयं उनकी सेवा से संतुष्ट थी.
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10 सप्ताह में लाभ देने का आदेश
हाईकोर्ट ने 1 नवंबर 2024 के सरकारी आदेश को रद्द करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि संतोष कुमार की सेवा नियमित की जाए और उन्हें पूर्व में समान परिस्थिति वाले कर्मचारी मोहम्मद अख्तर अंसारी की तरह सभी सेवानिवृत्ति एवं अन्य परिणामी लाभ दिए जाएं. अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को आदेश की प्रति प्राप्त होने से 10 सप्ताह के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया और याचिका स्वीकार कर ली.
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