आम के बगीचों में मौसम की मार, किसान मायूस

बारिश की मार झेल रहे मैक्लुस्कीगंज के आम बागान के मालिक व व्यवसाय जुड़े लोग मायूस हो गये हैं.

मैक्लुस्कीगंज. बेमौसम बारिश की मार झेल रहे मैक्लुस्कीगंज के आम बागान के मालिक व व्यवसाय जुड़े लोग मायूस हो गये हैं. जनवरी व फरवरी माह में बागानों में आम के पेड़ों पर भरपूर मंजर लगी थी. पेड़ो पर लगे आम के मंजर से पूरा मैक्लुस्कीगंज सुगन्धित था. वहीं बागान मालिक व आम के व्यापारियों के चेहरों पर रौनक थी. बेमौसम बारिश हो या अत्यधिक गर्मी वजह चाहे जो भी हो मैक्लुस्कीगंज में इस वर्ष अचार डालने के लिए भी आम के लाले पड़ गये हैं. मंजर के बाद पेड़ो पर अच्छे खासे टिकोरे भी लगे, बेमौसम बरसात ने कुछ नुकसान किया, वहीं फलों को भारी क्षति अत्यधिक गर्मी से भी हुई. इस तरह बागान मालिकों व आम के व्यापारियों को लाखों का नुकसान उठाना पड़ रहा है. यह लगातार तीसरा वर्ष है जब आम की पैदावार नष्ट हुई है. आलम यह है कि रांची सहित दूसरे जगहों से विक्रेता आम मंगवाकर गंज वासियों को बेच रहे हैं.

क्या कहते हैं जानकार

लोगों का रोजगार भी मार खा रहा है : सुशील तिवारी

फ़ोटो 1- सुशील तिवारी फ़ोटो 2 वीरान जागृति विहार के बागान.

मैक्लुस्कीगंज स्थित जागृति विहार के सदस्य सह सेवानिवृत्त शिक्षक सुशील तिवारी लगातार 1988 से मैक्लुस्कीगंज के पर्यावरण पर गहरी नजर रख रहे हैं, उन्होंने कहा मैक्लुस्कीगंज में इस वर्ष आम के बगीचों में सन्नाटा पसरा है. सैकड़ों स्थानीय महिला-पुरुष बेरोजगार हैं. जागृति विहार में भी 170 पेड इस बार फल विहीन है. आम होने से तीन चार महीनों के लिए स्थानीय लोगों को रोजगार मिल जाता था, जिससे वे वंचित रह गये, उनमें गहरी निराशा है. कभी महानगर तक उच्च गुणवत्ता वाले दुधिया लंगड़ा, गुलाबखाश, दशहरी और अनेक तरह के आम की आपूर्ति करने वाला मैकलुस्कीगंज आज फसल उत्पादन में क्यों पिछड़ रहा है, यह स्थानीय लोगों के साथ सरकार के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए.

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अवैध पेड़ो की कटाई बड़ा कारण है : ऐशली गोम्स

फ़ोटो 3 – ऐशली गोम्स. मैक्लुस्कीगंज से एंग्लो समुदाय के.

भूतपूर्व एंग्लो इंडियन प्रेसिडेंट स्व0 जुडी मेडोंका के बेटे ऐशली गोम्स ने इस विषय पर चर्चा कर कहा कि मैक्लुस्कीगंज में अवैध पेड़ो की कटाई से जंगलों के साफ होना व भारी मात्रा में सॉइल इरोशन कहीं न कहीं इसका मुख्य कारण हो सकता है. पहले गंज में अमरूद और आम कोलकाता भेजा जाता था. दशकों पहले अमरूद के बागान खत्म हुई और अब मैक्लुस्कीगंज में आम की पैदावार के साथ साथ व्यापार भी सिमट कर रह गया है. मायूस होते हुए उन्होंने कहा पर्यटन गांव को किसी की नजर लग गयी है, मैक्लुस्कीगंज की वो मनमोहक खुशबू कही गुम सा हो गया है.

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इस बार बहुत कम हो हुई फसल : शमीम खान

फ़ोटो 4 – शमीम खान, मैक्लुस्कीगंज निवासी.आम के धंधे से जुड़े लगभग 72 वर्षीय शमीम खान उर्फ टैनी खान बताते हैं कि वे पांच दशकों से आम के बागान व फलों के व्यापार से जुड़कर रोजी रोटी की जुगाड़ करते आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि 17 से 22 वर्ष पूर्व आम के वृक्षों, फलों में किसी तरह की कोई बीमारी नहीं थी. बागानों में प्रत्येक वर्ष अच्छी पैदावार हो जाती थी, अब तो एक वर्ष पारी कर के आम फलते हैं. उन्होंने कहा कि पिछले पांच दशक में इस वर्ष जैसे आम के लाले कभी नहीं पड़े.

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पर्यावरण का कुप्रभाव पड़ रहा है : रानी कंचन प्रभा देवी

फ़ोटो 5 – रानी कंचन प्रभा देवी

मैक्लुस्कीगंज जोभीया निवासी दीपक राणा जंग बहादुर की मां रानी कंचन प्रभा देवी (105) वर्ष, त्रिपुरा स्टेट के राज घराने के ब्रजेंद्र किशोर देवबर्मन की पुत्री हैं. और वे 1971 से लगातार मैक्लुस्कीगंज में ही रह रही हैं. उन्होंने कहा कि 70- 80 के दशक में आम, अमरूद, बेर, तुत, लीची की खुशबू चारों तरफ रहती थी. कहा कि पर्यटन व शिक्षा के क्षेत्र में ख्याति की ओर अग्रसर मैक्लुस्कीगंज में आम बागान व बंगले ऐतिहासिक धरोहर हैं. आम सहित सब्जियों की खेती पर भी पर्यावरण का कुप्रभाव पड़ रहा है. आम के बागानों को संरक्षण की जरूरत. मैक्लुस्कीगंज में कभी लगभग 465 बंगला व आम के बागान थे.

————मैक्लुस्कीगंज में कुछ विख्यात बागानों में….लालबंगला, गुलमोहर, जागृति विहार, मित्रा बंगला, पीटर बंगला, बूट फार्म, पुजारी बंगला, टैक्सेरा बंगला, बक्शी बंगला, राजा बंगला, फादर बंगला, (घोष) फैक्ट्री बंगला, माइकल बंगला, बेकर बंगला, लुकस बंगला, कन्हाई बंगला, झारखंड बाग, कुमकुम लॉज बंगला, खन्ना बंगला, मेहता बंगला, हुंडल बंगला सहित कई अन्य किस्मों के आम मिलते हैं.

फ़ोटो 6 – पिछले वर्ष की तस्वीर दूधिया लंगड़ा, फाइल फोटो.

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मैक्लुस्कीगंज के बागानों में विभिन्न किस्मों के आम :

अल्फांसो, दूधिया लंगड़ा, तोतापरी, फजली, बम्बइया, किसुनभोग, आम्रपाली, बिजुआ, मालदा, सिंदुरिया, सफेदा, काला पहाड़, दसहरी, सीपिया, अनरसा आदि किस्मों के आम मैक्लुस्कीगंज के बागानों में आज भी मिल जाते हैं.

आंधी-तूफान व तेज धूप में गिर गये पेड़ों पर लगे मंजरB

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