रांची : झारखंड के पथ निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंताओं से अधीक्षण अभियंता (Superintending Engineer) के पद पर होने वाली प्रोन्नति से जुड़े विवाद में शीर्ष अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है. झारखंड उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 26 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है. इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि झारखंड हाईकोर्ट द्वारा 2 सितंबर 2024 को याचिका संख्या 3508/2024 में जारी किया गया वह अंतरिम आदेश आगे भी लागू रहेगा, जिसके तहत प्रक्रिया पूरी होने तक किसी भी नई प्रोन्नति पर रोक लगाई गई थी. सर्वोच्च न्यायालय के इस ताजा आदेश के बाद संबंधित पदों पर फिलहाल नई पदोन्नति की तमाम राहें बंद हो गई हैं.
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की दलीलें
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह याचिका (SLP No. 29469/2026) याचिकाकर्ता देव सहाय भगत और अन्य की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें झारखंड उच्च न्यायालय के 9 जून 2026 के फैसले को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अदालत के समक्ष पक्ष रखा. उन्होंने अदालत को बताया कि पथ निर्माण विभाग ने कार्यपालक अभियंता वर्ग-1 श्रेणी से अधीक्षण अभियंता पद की प्रोन्नति तय करते समय सहायक अभियंता के स्तर की वरीयता को आधार बनाया है. ऐसा करने के कारण अनुसूचित जनजाति (ST) श्रेणी के कई वरिष्ठ अभियंताओं को उनके न्यायसंगत हक और प्रोन्नति से वंचित कर दिया गया है. इसी विवाद से जुड़ी एक अन्य विशेष अनुमति याचिका (SLP No. 29502/2026) भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, जिस पर अदालत एक साथ विचार कर रही है.
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क्या था झारखंड हाईकोर्ट का फैसला और अभ्यर्थियों का विरोध
इससे पूर्व, 9 जून 2026 को झारखंड उच्च न्यायालय ने आरक्षित कोटि (SC-ST) के अभियंताओं द्वारा अधीक्षण अभियंता पद की प्रोन्नति को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था. हाईकोर्ट ने 6 अगस्त 2019, 21 अक्टूबर 2022 और 11 जनवरी 2024 को जारी प्रोन्नति अधिसूचनाओं को रद्द करने से साफ इनकार करते हुए प्रार्थियों को अपने-अपने कोटे के तहत ही दावा पेश करने का सुझाव दिया था. 12 कार्यपालक अभियंताओं को अधीक्षण अभियंता पद पर दी गई प्रोन्नति के खिलाफ दो अलग-अलग याचिकाएं (W.P.(S) No. 349/2024 और 3508/2024) दायर की गई थीं. प्रार्थी प्रदीप कुमार और राम बदन सिंह (एससी श्रेणी) तथा सुनील कुमार, रामेश्वर साह, देवा सहाय भगत, दुखा मुंडा और बाल किशोर किस्कू (एसटी श्रेणी) का तर्क था कि वे कार्यपालक अभियंता के पद पर पहले प्रोन्नत हुए थे, लेकिन उनके बाद प्रोन्नत हुए कनिष्ठ अभियंताओं को अधीक्षण अभियंता बना दिया गया, जबकि वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें इस अधिकार से वंचित रखा गया.
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