सखुआ की टहनी: संताल हूल की अनूठी संचार प्रणाली

Santhal Hul: संताल हूल में सखुआ की टहनी केवल संदेश का माध्यम नहीं, बल्कि युद्ध के आह्वान और एकजुटता का प्रतीक थी. जानिए कैसे इस पारंपरिक संचार प्रणाली ने 1855 के संताल विद्रोह को संगठित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और अंग्रेजों को चकमा दिया.

रांची से स्वतंत्र लेखक आदित्य राज नीरद की रिपोर्ट

Santhal Hul: संताल हूल में जिन देशज प्रणालियों का उपयोग हुआ था, उनमें एक थी संवाद की अनूठसंचार प्रणाली – सखुआ की टहनी. दरअसल, जनजातीय और विशेष कर झारखंड की जनजातीय संस्कृति अपनी समृद्ध परंपराओं और अनूठी संचार प्रणालियों के लिए जानी जाती है. आधुनिक तकनीक के आने से पहले यहां की जनजातियों ने सूचनाओं के आदान-प्रदान और सामुदायिक समन्वय के लिए कई प्रभावी माध्यम विकसित किए थे. झारखंड की सभी 32 जनजातियों में संवाद-प्रेषण और संवाद-प्रसार के लिए विशिष्ट माध्यमों का उपयोग किया जाता रहा है, जिन्हें हम दो श्रेणियों में बांट सकते हैं- एक दृश्य और दूसरा श्रव्य.

उलगुलान में संचार माध्यमों की भूमिका

1855-56 के संताल हूल और 1895-1900 के उलगुलान में इन संचार माध्यमों की अहम भूमिका थी. हूल और उलगुलान में यह संचार माध्यम ‘युद्ध के निमंत्रण’ और ‘एकजुटता के प्रतीक’ के रूप में प्रयोग किया गया. हूल में दृश्य माध्यमों के प्रयोग की चर्चा मिलती है.

  • दृश्य माध्यम: दृश्य माध्यम मूलत: सांकेतिक एवं प्रतीकात्मक वस्तुएं (Symbolic Objects) हैं. इसमें खास वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान भेजकर बिना बोले बड़े संदेश दिये जाते हैं. इसमें जिन वस्तुओं का प्रयोग होता है, उनमें सखुआ (साल) के पत्ते, रस्सी, हल्दी और अक्षत, धुआं, पदचिह्न और चिह्न शामिल हैं.

सखुआ (साल) के पत्ते और संताल हूल

झारखंड की संताल जनजातीय समाज में सखुआ (साल) के पत्ते को संवाद-प्रेषण और संवाद-प्रसार के लिए उपयोग में लाया जाता है. यह मूलत: बैठक की सूचना देने के लिए होता है. अगर किसी गांव से दूसरे गांव में सखुआ के पत्ते भेजे जाते थे, तो इसका मतलब होता था कि सामूहिक बैठक या ‘पंचायत’ बुलाई गई है. व्यापक स्तर पर संदेश देने के लिए साप्ताहिक हाटों को चुना जाता है. ऐसा इसलिए कि हाट में एक से ज्यादा गांव के लोग आते हैं और ज्यादा-से-ज्यादा गांवों तक संवाद पहुंचाना आसान होता है. किसी गांव का एक व्यक्ति अगर इस माध्यम से बैठक की सूचना प्राप्त करता है, तो वह अपने गांव लौटने पर वहां के बाकी लोगों से यह जानकारी साझा करता है. इस प्रकार, जितने दूर तक संवाद भेजना होता है, उतने साप्ताहिक हाटों में सखुआ (साल) के पत्ते भेजे जाते हैं.

सूचना प्रसार में संवदिया की भूमिका

इस माध्यम में सूचना देने के लिए एक संवदिया (मैसेंजर /संवाद ले जाने वाला व्यक्ति) चुना जाता है. वह ऊंचे बांस में सखुआ के पत्तों को बांध कर उस गांव, क्षेत्र और हाट में पहुंचता है, जहां के लोगों को सूचना देनी होती है. कई बार एक से ज्यादा संवदिया होता है, जो अलग-अलग दिशाओं में जाता है और अलग-अलग गांवों और हाटों में पहुंच कर संवाद का प्रसार करता है. वह चुपचाप घूमता रहता है. उसे देख कर लोग जान जाते हैं कि वह किसी बैठक या पंचायत की सूचना देने आया है. लोग उसके पास पहुंचते हैं और बैठक या पंचायत स्थल की जानकारी प्राप्त करते हैं.

सखुआ के पत्तों से दिन की संख्या की पहचान

इसमें विशिष्ट बात यह होती है कि बांस के शीर्ष में बंधे सखुआ के पत्तों की संख्या इस बात का प्रतीक होती है कि बैठक या पंचायत कितने दिन बाद होनी है. अगर बैठक सातवें दिन होनी है, तो सात पत्ते होंगे. अगले दिन जब वही मैसेंजर फिर सूचना देने निकलेगा, तो एक पत्ता तोड़ कर हटा देगा. अब पत्तों की संख्या छह हो जायेगी. इसी तरह जैसे-जैसे बैठक के दिन घटते जायेंगे, वैसे-वैसे पत्तों की संख्या भी घटती जायेगी.

संताल हूल में सखुआ की टहनी का उपयोग

1855-56 के ‘संथाल हूल’ के दौरान सूचना के इस माध्यम का व्यापक रूप से उपयोग हुआ था. सखुआ (साल) की टहनी का उपयोग केवल एक लकड़ी के टुकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘युद्ध के निमंत्रण’ और ‘एकजुटता के प्रतीक’ के रूप में किया गया था. जब सिदो-कान्हू ने अंग्रेजों, जमींदारों और महाजनों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका, तो उन्होंने संदेश पहुंचाने के लिए सखुआ की टहनी को चुना. इसे एक गांव से दूसरे गांव ‘दौड़ाकर’ पहुंचाया गया. यह इतिहास में संचार (Communication) का सबसे अनोखा और प्रभावी उदाहरण माना गया.

गुप्त संचार से भोगनाडीह में जुटे हजारों संताल

सखुआ के पत्तों को घुमाना गुप्त संचार (Secret Code) था. उस समय पत्र या लिखित संदेश पकड़ में आने का डर था, लेकिन जंगल में लकड़ी की टहनी ले जाते किसी आदिवासी पर शक करना मुश्किल था. लिहाजा, ब्रिटिश जासूस और अधिकारी यह समझ ही नहीं पाये कि ये आदिवासी आपस में क्या साझा कर रहे हैं. जब तक उन्हें पता चला, तब तक (30 जून, 1855 को) हजारों संताल तीर-धनुष लेकर ‘भोगनाडीह’ में जमा हो चुके थे. सूचना का यह माध्यम कितना प्रभावी था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि भोगनाडीह (वर्तमान साहिबगंज जिले के बरहेट प्रखंड का गांव, जो सिदो-कान्हू की जन्मस्थली, उनका गांव है) में उस दिन 30 हजार लोग जमा हुए थे.

एकजुटता की शपथ का प्रतीक

सूचना का यह माध्यम एकजुटता की शपथ का भी प्रतीक था. जो भी ग्राम प्रधान (मांझी) उस टहनी को स्वीकार करता था, इसका मतलब होता था कि वह और उसका पूरा गांव इस धर्मयुद्ध (हूल) में शामिल होने के लिए तैयार है. संवाद के इस माध्यम का उपयोग संताल हूल के पहले और हाल के वर्षों में भी संताल समाज की खास बैठक और पंचायत की सूचना देने के लिए किया जाता रहा है.

क्या कहते हैं इतिहासकार

1855-56 के संताल हूल में सखुआ के पत्ते को घुमाने का उल्लेख प्राय: सभी इतिहासकारों ने किया है. एलएसएस ओ’मैली (L.S.S. O’Malley) ने ‘Bengal District Gazetteers: Santal Parganas’ (1910) में इस पारंपरिक संचार प्रणाली का स्पष्ट उल्लेख किया है. ओ’मैली ने लिखा है- “A sal tree branch was sent forth and passed from village to village to beat up the recruits” अर्थात युवाओं को इकट्ठा करने और विद्रोह का आह्वान करने के लिए साल (सखुआ) के पेड़ की एक टहनी भेजी गई थी, जो एक गांव से दूसरे गांव पहुंचाई जाती थी. (Bengal District Gazetteers: Santal Parganas, Chapter II: History, Page 48).

ओ’मैली के अलावा, संताल हूल के इस ‘सखुआ संचार’ का उल्लेख कई प्रामाणिक ऐतिहासिक पुस्तकों में किया गया है. प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. काली किंकर दत्ता ने अपनी पुस्तक ‘The Santal Insurrection of 1855-57’ (मूल प्रकाशन 1940, कलकत्ता विश्वविद्यालय) में विस्तार से बताया है कि कैसे सखुआ की टहनी ने ‘युद्ध के संदेशवाहक’ (Messenger of War) के रूप में काम किया. उन्होंने यह भी जिक्र किया है कि यह टहनी ‘हूल’ के आह्वान का एक अनिवार्य हिस्सा थी. काली किंकर दत्ता यह पुस्तक इस विद्रोह पर सबसे विस्तृत शोध पुस्तक मानी जाती है. पुस्तक के अध्याय 2 (Chapter II) ‘The Outbreak of the Insurrection’ में साल (सखुआ) की टहनी का यह ऐतिहासिक विवरण दर्ज है- ‘A twig of a Sal tree circulated from village to village was a messenger of war, and at its sight the Santals gathered together with their traditional weapons of bows, arrows and axes, ready for the fray.” (हिंदी अनुवाद : “गांव-गांव घुमाई जाने वाली साल के पेड़ की एक टहनी युद्ध का संदेशवाहक थी, और इसे देखते ही संथाल अपने पारंपरिक हथियारों जैसे धनुष, तीर और कुल्हाड़ियों के साथ लड़ाई के लिए तैयार होकर एक साथ इकट्ठा हो जाते थे”).

कलकत्ता रिव्यू-1855 लिखता है- ‘Sidhu and Kanhu installed an idol of Thakur in the home garden and arranged for his ritualistic worship, while simultaneously disseminating a mysterious message through the symbol of a Sal tree branch. A day was fixed for a gathering where all the Santhals could hear the message of their Thakur. Thus, on the 30th of June, 1855, about 10,000 Santals met at Bhagnadihi, when the divine order that the Santals should get out of their oppressors’ control was announced to them by Sidhu and Kanhu.’
अर्थात सिद्धू और कान्हू ने घर के बगीचे में ठाकुर की मूर्ति स्थापित की और उनकी विधिवत पूजा-अर्चना का प्रबंध किया, साथ ही साथ साल के पेड़ की टहनी के प्रतीक के माध्यम से एक रहस्यमय संदेश का प्रसार भी किया. एक सभा के लिए दिन निश्चित किया गया, जहां सभी संथाल अपने ठाकुर का संदेश सुन सकें. इस तरह, 30 जून 1855 को लगभग 10,000 संथाल भागनाडीह में इकट्ठा हुए, जब सिद्धू और कान्हू ने उन्हें यह दैवीय आदेश सुनाया कि संथालों को अपने उत्पीड़कों के नियंत्रण से बाहर निकल जाना चाहिए.

डब्लू. डब्लू. हंटर ने ‘The Annals of Rural Bengal’ में संताल जीवन और उनके विद्रोह का सजीव वर्णन किया है. उन्होंने सखुआ के पत्तों और टहनियों के माध्यम से सूचना के प्रसार को संतालों की संगठनात्मक शक्ति का प्रमाण बताया है.

जेएफ डाल्टन ने अपनी पुस्तक ‘The Santals’ में इसका विस्तार से वर्णन किया है. डाल्टन ने ‘Descriptive Ethnology of Bengal’ में भी संताल समाज की संचार व्यवस्था का उल्लेख किया है, जिसमें उन्होंने साल (सखुआ) के महत्व और विद्रोह के दौरान इसके प्रतीकात्मक उपयोग को रेखांकित किया है.

इतिहासकार पीसी रॉय चौधरी बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर्स (संताल परगना) (1965) के संशोधित संस्करण में रॉय चौधरी ने भी ओ’मैली के तथ्यों को दोहराते हुए सखुआ टहनी के वितरण को विद्रोह के तेजी से फैलने का मुख्य कारण माना है. रॉय चौधरी उल्लेख करते हैं कि विद्रोह की शुरुआत केवल मौखिक नहीं थी, बल्कि इसे एक “दृश्य प्रतीक” के माध्यम से गति दी गई थी. उन्होंने लिखा है, “सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में विद्रोह की घोषणा के प्रतीक के रूप में साल के पेड़ की एक टहनी (Sal Branch) को एक गांव से दूसरे गांव भेजा गया था.” उनके अनुसार, यह टहनी ‘मांझियों’ (गांव के प्रधानों) के माध्यम से एक शृंखला की तरह घूमती थी. टहनी एक गांव से दूसरे गांव बहुत तीव्र गति से पहुंचाई जाती थी. जब एक गांव का मांझी इसे प्राप्त करता था, तो वह इसे अगले गांव तक पहुंचाने के लिए उत्तरदायी होता था. ‘मांझी’ टहनी प्राप्त करते ही अपने सबसे तेज दौड़ने वाले युवक को अगले गाँव के लिए रवाना कर देता था. यह आज के ‘रिले रेस’ जैसा था. यह प्रक्रिया इतनी तीव्र थी कि बहुत कम समय में पूरा संताल परगना इस ‘हूल’ की सूचना से अवगत हो गया. उन्होंने इसे इस ‘सखुआ संचार’ को संथालों की युद्धनीति का एक अनिवार्य हिस्सा माना है. उन्होंने सखुआ की टहनी को “Call to Arms” (शस्त्र उठाने का बुलावा) कहा. जब टहनी गांव में पहुंचती थी, तो इसका मतलब होता था कि अब खेती का काम छोड़कर युद्ध की तैयारी करनी है.

रॉय चौधरी ने स्पष्ट किया है कि सखुआ की टहनी का वितरण केवल एक सूचना नहीं थी, बल्कि यह “एकजुटता की शपथ” थी. जिस भी व्यक्ति या समूह ने इस टहनी को स्वीकार किया, उन्होंने सिद्धू और कान्हू के आदेशों का पालन करने और बाहरी लोगों (दीकुओं) को खदेड़ने की प्रतिज्ञा ली. रॉय चौधरी के अनुसार, इसी सखुआ टहनी के संचार का परिणाम था कि 30 जून, 1855 को भोगनाडीह में 400 गांवों के लगभग 10,000 (बाद में 30,000 तक) संताल एकत्रित हो सके.

पीसी रॉय चौधरी ने यह भी जोड़ा है कि उस समय के डिप्टी कमिश्नर और ब्रिटिश अधिकारियों के पास इस “कोड लैंग्वेज” (टहनी भेजना) को समझने का कोई तरीका नहीं था, जिससे संतालों को अपनी रणनीतिक योजना बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल गया.

कहां से आई सखुआ के पत्ते को घुमाने की अवधारणा

सखुआ के पत्ते को घुमाने की अवधारणा और इसके विशिष्ट आयामों को डिकोड करने पर इसके सांस्कृतिक मूल्य का भी ज्ञान होता है. एक तो यह प्राकृतिक से जुड़ाव को ध्वनित करता है. दूसरा कि सखुआ संतालों का पूजनीय वृक्ष है. संताल इस पेड़ की पूजा करते हैं. उनके पूजास्थल ‘जाहेरथान’ और ‘मांझीथान’ में सखुआ के पेड़ अवश्य होते हैं. सखुआ के फूल की भी पूजा की जाती है. फागुन माह में मनाया जाने वाला संतलों के दूसरे बड़े पर्व ‘बाहा’ में सखुआ के पेड़ और फूल की विशिष्ट पूजा होती है और नायके (पुजारी) सखुआ के फूल लोगों को देकर ‘बाहा’ मनाने का सामूहिक आमंत्रण देते हैं. उस दिन पुरुष कान पर और महिलाएं जूड़े में सखुआ के फूल झोंसते हैं. संताल लोकगाथा और मिथक में भी सखुआ के पेड़ की महत्ता का वर्णन है. इस तरह, सूचना देने के लिए इसकी टहनी भेजना एक पवित्र आदेश की तरह माना जाता है.

ओ’मैली और पीसी रॉय चौधरी के विवरणों में जो सबसे महत्वपूर्ण कंटेंट (उभर कर आता है, वह यह है कि सखुआ की टहनी का घूमना केवल एक सूचना नहीं, बल्कि एक ‘पवित्र आदेश’ था. रॉय चौधरी ने सिदो-कान्हू के उन दावों का भी जिक्र किया है, जहां उन्होंने कहा था कि उन्हें ‘ठाकुर जी’ (ईश्वर) के दर्शन हुए हैं. सखुआ की टहनी को इसी दैवीय आदेश का प्रसार माना गया, जिससे विद्रोह को एक धार्मिक और सामाजिक स्वरूप मिला. डॉ केके दत्ता ने भी लिखा कि सिद्धू और कान्हू ने दावा किया था कि उन्हें ‘ठाकुर जी’ (ईश्वर) के दर्शन हुए हैं. सखुआ की टहनी के साथ जो संदेश भेजे जाते थे, उनमें यह संदेश होता था कि यह आदेश किसी मनुष्य का नहीं, बल्कि साक्षात ठाकुर जी का है. जो भी इस आदेश को नहीं मानेगा, उसे दैवीय कोप का सामना करना होगा. इस धार्मिक पुट ने संचार को अत्यंत शक्तिशाली और अनिवार्य बना दिया.

बहरहाल, संचार की इस प्रणाली का एक विशिष्ट तथ्य है- टहनी की ताजगी. ताजी टहनी का अपना प्रतीकात्मक अर्थ है. यदि टहनी के पत्ते हरे और ताजे होते हैं, तो इसका अर्थ है कि बैठक की तैयारी तुरंत करनी है और सभी को इकट्ठा होना है.

‘रस्सी घुमाना’ और उलगुलान

झारखंड की अन्य जनजातीय क्रांतियों में ‘रस्सी घुमाना’ या ‘गांठ वाली रस्सी’ का प्रयोग संदेश भेजने का एक और अत्यंत सटीक और गुप्त तरीका था. जब सखुआ की टहनी के साथ-साथ और अधिक विशिष्ट जानकारी भेजनी होती थी, तो रस्सी का उपयोग किया जाता था. इसके पीछे का विज्ञान और अर्थ बहुत ही दिलचस्प है. संदेश का यह तरीका भी सखुआ की टहनी घुमाने जैसा ही था. इसमें संदेशवाहक पत्ते की जगह रस्सा लेकर विचरण करता था. रस्सा में गांठें बंधी होती थीं. दिनों की गणना विद्रोह के समय जब अलग-अलग गांवों को एक निश्चित दिन पर एक साथ हमला करना होता था, तो संदेशवाहक एक रस्सी लेकर चलता था, जिसमें गांठें लगी होती थीं. हर बीतते दिन के साथ, गांव का प्रधान उस रस्सी की एक गांठ खोल देता था. जब सारी गांठें खुल जाती थीं, तो इसका मतलब होता था कि ‘आज ही वह दिन है’, जब सभी को हथियार उठाकर कूच करना है. इससे बिना घड़ी या कैलेंडर के हजारों लोग एक ही समय पर एकजुट हो जाते थे.

भगवान बिरसा मुंडा के इस ऐतिहासिक आंदोलन ‘उल्गुलान’ और इसमें संदेश भेजने के लिए ‘गांठ वाली रस्सी’ या अन्य पारंपरिक गुप्त प्रतीकों के उपयोग का सबसे प्रामाणिक, विस्तृत और साक्ष्य-आधारित वर्णन प्रख्यात इतिहासकार डॉ कुमार सुरेश सिंह की कालजयी ‘Birsa Munda and His Movement (1874-1901)’ पुस्तक में मिलता है- “The movement was thoroughly organized. Messengers were sent out to all parts of the Munda country… The organizational apparatus consisted of a network of meetings, a series of secret consultations and an efficient system of messengers.” अर्थात आंदोलन पूरी तरह से संगठित था. मुंडा क्षेत्र के सभी हिस्सों में संदेशवाहक भेजे गए थे… संगठनात्मक तंत्र में बैठकों का एक नेटवर्क, गुप्त परामर्शों की एक शृंखला और संदेशवाहकों की एक कुशल प्रणाली शामिल थी. (Chapter V: The Second Phase of the Movement).

हालांकि, ‘गांठ वाली रस्सी’ और ‘रस्सी घुमाना’ विशेष रूप से बिरसा मुंडा के उल्गुलान की पहचान बना, लेकिन झारखंड के इतिहास में संदेश भेजने का एक और ऐसा ही प्रतीक 1831-32 के ‘कोल विद्रोह’ (बुधु भगत और बिंदराय मानकी के नेतृत्व में) में भी देखा गया था. वहां रस्सी के साथ-साथ ‘सुआ चरी’ (तीर घुमाना) और अनाज के दानों का इस्तेमाल अलग-अलग गांवों को युद्ध के लिए आमंत्रित करने हेतु किया जाता था. इनके अतिरिक्त ये पारंपरिक तरीके भी संवाद और संचार के माध्यम के रूप में प्रचलित रहे हैं.

रस्सी के छल्ले

कई बार रस्सी को ‘छल्ले’ के रूप में एक गांव से दूसरे गांव भेजा जाता था. इसका प्रतीकात्मक अर्थ था कि “हम सब एक ही बंधन में बंधे हैं.” यदि कोई गांव उस रस्सी को स्वीकार कर आगे बढ़ा देता, तो इसका मतलब था कि वे विद्रोह के गठबंधन का हिस्सा बन चुके हैं.

रस्सी लहराना

हूल और जनजातीय विद्रोह के दौरान रस्सी लहराने की क्रिया को भी सूचना देने के तरीके के रूप में इस्तेमाल किया गया. रस्सी को खास तरह से घुमाना या लहराना दूर से ही संकेत देने का काम करता था. अगर कोई संदेशवाहक ऊंचे स्थान पर खड़े होकर रस्सी या चाबुक जैसी किसी वस्तु को विशेष दिशा में घुमाता था, तो नीचे घाटी में छिपे लड़ाके समझ जाते थे कि दुश्मन (अंग्रेजी सेना) किस दिशा से आ रही है.

इसे भी पढ़ें: हूल दिवस पर दुमका में शहीदों को श्रद्धांजलि, बसंत सोरेन और सीता सोरेन समेत कई लोगों ने किया माल्यार्पण

जनजातीय समाज में सांकेतिक माध्यमों का व्यापक प्रयोग

जनजातीय समाज में संवाद और संचार के लिए सांकेतिक माध्यमों का व्यापक प्रयोग हुआ है. झारखंड का जनजातीय संवाद तंत्र पूरी तरह से प्रकृति और समुदाय पर आधारित था. यह न केवल सूचना पहुंचाने का जरिया था, बल्कि लोगों को एक सूत्र में बांधने का माध्यम भी था.

इसे भी पढ़ें: लहू से लिखा हूल: पहली बार प्रभात खबर की पहल पर इतिहासकारों ने जोड़े हूल के बिखरे हिस्से

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: Kumarvishwat sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >