World Indigenous Day: विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में सोमवार को बगईचा, नामकुम में आदिवासियत के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार को लेकर खुली चर्चा आयोजित की गयी. विभिन्न आदिवासी संगठनों के संयुक्त अभियान के तहत आयोजित कार्यक्रम में राज्य के अलग-अलग जिलों से प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम में आदिवासी समुदाय की स्वतंत्र पहचान, धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं, जल-जंगल-जमीन और आदिवासी इतिहास को लेकर विस्तार से चर्चा हुई. कार्यक्रम के अंत में आदिवासियत के संरक्षण और संवर्धन के लिए राज्य के विभिन्न जिलों के गांव-गांव में चर्चा अभियान चलाने का निर्णय लिया गया. इसके साथ ही डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर अधिक से अधिक युवाओं तक इस अभियान को पहुंचाने पर भी सहमति बनी.
छह महीने से चल रहा है वैचारिक अभियान
कार्यक्रम में सुखनाथ लोहरा ने अभियान की पृष्ठभूमि रखते हुए कहा कि आदिवासियत पर हो रहे वैचारिक हमलों के खिलाफ पिछले छह महीने से राज्यभर में अभियान चलाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े मुद्दों पर व्यापक स्तर पर संवाद की जरूरत है. शोधार्थी आकृति लकड़ा ने कहा कि लंबे समय से आदिवासियत पर विभिन्न संगठित धार्मिक और वैचारिक धाराओं का प्रभाव बढ़ा है. इसका असर आदिवासी युवाओं पर भी पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में युवा अपनी पहचान से जुड़े सवालों का सामना कर रहे हैं और इस विषय पर समाज के भीतर गंभीर चर्चा जरूरी है.
आदिवासी पहचान को लेकर आरएसएस पर आरोप
कवयित्री जसिंता केरकेट्टा ने आरोप लगाया कि आदिवासियत पर सबसे संगठित वैचारिक हमला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और उससे जुड़े संगठनों की ओर से किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से ही आरएसएस से जुड़े संगठन आदिवासियों की स्वतंत्र पहचान को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं.
'सरना-सनातन एक' से आदिवासियत छुपाने की कोशिश
उन्होंने जनजाति सुरक्षा मंच और वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों का उल्लेख करते हुए कहा कि आदिवासियों को 'आदिवासी' के बजाय 'वनवासी' के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. उनके अनुसार, इससे आदिवासी समुदाय की स्वतंत्र सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ता है. वक्ताओं ने आरोप लगाया कि 'सरना-सनातन एक' जैसे नारों के माध्यम से आदिवासी धार्मिक पहचान को व्यापक हिंदू पहचान में समाहित करने का प्रयास किया जा रहा है. उन्होंने इसे आदिवासियों के स्वतंत्र अस्तित्व और धार्मिक पहचान के लिए चुनौती बताया.
अलग धार्मिक पहचान और जनगणना कोड की मांग
पूर्व मंत्री और सामाजिक कार्यकर्ता गीताश्री उरांव ने कहा कि आदिवासी समुदाय की स्वतंत्र धार्मिक व्यवस्था को अब तक औपचारिक मान्यता और जनगणना में अलग कोड नहीं मिला है. उन्होंने कहा कि सरना धर्म को अलग पहचान देने की मांग लंबे समय से उठायी जा रही है. गीताश्री उरांव ने आरोप लगाया कि मनुवादी संगठनों की ओर से इस मांग का विरोध किया जाता है. उन्होंने आदिवासी धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक विमर्श की आवश्यकता बतायी.
जल, जंगल, जमीन को आदिवासियत का आधार बताया
सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कहा कि आदिवासियत का मूल आधार जल, जंगल और जमीन है. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा सरकार के कार्यकाल में आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बढ़ा है और इसका सीधा असर आदिवासी समुदाय के अस्तित्व पर पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के अधिकारों और संसाधनों की रक्षा के लिए सामाजिक स्तर पर जागरूकता और सामूहिक संघर्ष को मजबूत करने की जरूरत है.
धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों पर भी जतायी चिंता
शोधार्थी जयकिशन गोडसोरा ने आदिवासियों के सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों को लेकर चिंता जतायी. उन्होंने आरोप लगाया कि कई आदिवासी धार्मिक स्थलों को अपने कब्जे में लेकर वहां हिंदू वर्ण व्यवस्था आधारित पूजा पद्धति स्थापित करने के उदाहरण सामने आये हैं. कार्यक्रम में आदिवासी इतिहास को शिक्षा व्यवस्था में पर्याप्त स्थान नहीं मिलने का मुद्दा भी उठाया गया. जेनजी सुनीता बोईपाई ने कहा कि स्कूल और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रमों में आदिवासी इतिहास को अपेक्षित जगह नहीं दी जाती. उन्होंने आदिवासी इतिहास और संस्कृति को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने पर जोर दिया.
गांव-गांव चलेगा संवाद, युवाओं तक पहुंचेगा अभियान
कार्यक्रम के अंत में आदिवासियत से जुड़े मुद्दों को लेकर राज्य के विभिन्न जिलों में गांव-गांव चर्चा आयोजित करने का निर्णय लिया गया. इसके साथ ही डिजिटल माध्यमों के जरिए युवाओं तक अभियान की पहुंच बढ़ाने की रणनीति तय की गयी. आयोजकों का कहना है कि आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति, धर्म और अधिकारों से जुड़े विषयों पर केवल बड़े आयोजनों तक चर्चा सीमित नहीं रहनी चाहिए. इन मुद्दों को गांवों और युवाओं के बीच ले जाना जरूरी है, ताकि समुदाय के भीतर व्यापक संवाद तैयार हो सके.
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कार्यक्रम में ये लोग रहे मौजूद
कार्यक्रम का संचालन दिनेश मुर्मू और एलिना होरो ने किया. पूर्व जज रत्नाकर भेंगरा, प्रफुल लिंडा, संजय महली, टॉम कावला, जयां द्रेज, प्रवीर पीटर, बिल्कन डांग समेत कई वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे. कार्यक्रम में झारखंड जनाधिकार महासभा, आदिवासी अधिकार मंच, आदिवासी संघर्ष मोर्चा, जोहार, मुंडा सभा, गांव गणराज्य परिषद, विस्थापित मुक्ति वाहिनी, आदिवासी मूलवासी अधिकार मंच, आदिवासी समन्वय समिति समेत विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए.
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